old women aasha tai

संस्मरण : आशा ताई

“सुनिए ‘आशा ताई’,” हां? अरे सुनिए तो, कहिए तो.. “आप सुनती ही कहा हैं. कब से आशा ताई आशा ताई कर रहें हैं.” “अरे कबसे सुन ही तो रही हूं. वैसे आज आप बड़ी तारीफ़ कर रहे हैं. आशा ताई…”… Read More

संस्मरण : अरे बाप रे!

अरे बाप रे, आप तो कंचे खेलते हैं. “क्यूं कंचे खेलना ग़लत हैं..? मै तो ताश भी खेलता हूं. तब तो ताश खेलना पाप हो जाएगा हैना..?” क्या..? ताश भी खेलते हैं. कल का जुआं भी खेलेंगे. हुंह! “तो क्या… Read More

Purnima ki raat

संस्मरण : पूर्णिमा की आंधेरी रात

आज तुम्हे एक रात की बात बताता हूँ जो थी तो पूर्णिमा की रात लेकिन मेरे जीवन की वो सबसे आंधेरी रात थी। ये बातें मैं सिर्फ तुमसे कह रहा हूँ क्योंकि तुम्हारे सिवा कोई भी मेरे इतने करीब नही… Read More

संस्मरण : परख

तुम देवी हो या चुड़ैल..? मै मानता हूं तेरा गुनाहगार हूं. तुम आज वर्षो बाद मिल रही हों. तुम्हें मुझसे कई सारी शिकायते हो रही है कि- “मैं कहा करता था कि तुम मेरी लिए देवी हो. मै तुम्हारें सिवाय… Read More

संस्मरण : आखरी मोक्ष-उज्जैन यात्रा

आज के ही दिन ठीक दो साल पहले भगवान महाकाल और सती के परम् भक्त राजा विक्रमादित्य की नगरी में अपुन मौजूद थे। दो साल पहले की इस घटना को यात्रा वृतांत या कहें संस्मरण का रूप देने का प्रथम… Read More

संस्मरण : स्कूल के वो दिन

पाँचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे… स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी इस पापबोध के साथ कि विद्यामाता नाराज न हो जायें, कक्षा के तनाव में पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर… Read More

पिता जी के रहते एक दिवाली थी पिता जी के बाद एक दिवाली है

जीवन के 25 वसन्त में यह तीसरी दिवाली होगी जब बिना पिता जी के आशीर्वाद के दिवाली बनाई जाएगी और मेरे जहन में वो यादें हमेशा ताज़ा बनी रहेंगी जो पिता जी के साथ बनी थीं। उन्हें ताउम्र अपने जीवन… Read More

संस्मरण : हमको तो चलना आता है केवल सीना तान के (भगवतीचरण वर्मा के जन्मदिवस पर विशेष)

कुछ लेखक होते हैं जो बहुत कुछ लिख जाने के बाद भी अपना पता नहीं दे पाते तो कुछ लेखक ऐसे भी होते हैं जिन की रचनाएं तुरंत उन का पता दे देती हैं। पर किसी लेखक की रचना ही… Read More

संस्मरण : साइकल

मुझे साइकल चलाना सीखना था। पर दुर्भाग्य से मेरे घर में साइकल नही थी। मोहल्ले के सभी बच्चे साइकल चलाते रोज दिख जाया करते थे। उन्हें साइकल चलाते देख कर मुझे रोज उनसे ईर्ष्या और खुद पर शर्मिंदगी महसूस होती। एक… Read More