dr rajendra prasad

कविता : डॉ. राजेंद्र प्रसाद

जीरादेई सीवान बिहार में तीन दिसंबर अठारह सौ चौरासी में, जन्मा था एक लाल। दुनिया में चमका नाम उसका, थे वो बाबू राजेंद्र प्रसाद।। तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष बन, संविधान सभा के अध्यक्ष रहे। राष्ट्रपति बन राजेंद्र बाबू जी, जन… Read More

tiranga

कविता : नया कश्मीर

लाल चौक पर फ़हरे तिरंगा मन में ये एक आशा है,कश्मीर बने स्वर्ग सुन्दर-सा दिल की ये अभिलाषा है।                  बहुत हुआ खून-खराबा                   रक्तरन्जित धरा ये कहे,                  सपूतो के तन में मेरे अब                   लहू प्रेम का बस बहे।  धारा-धारा कर तुमने  द्वेष की… Read More

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कविता : अन्नदाता किसान

अन्नदाता होकर भी ख़ुद पानी पीकर अपना भूख मिटाएँ पर जग को भूखा न सोने दे ऐसे अन्नदाता किसान हमारे… चाहे आँधी आये या तूफ़ान चिमिलाती धूप हो या कड़ाके की ठण्ड मेहनत करने से यह नहीं घबराते बच्चे समान… Read More

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कविता : प्रकृति

1. ऐ प्रकृति ऐ प्रकृति हमसे कुछ कहती है। तुम्हारे सारे शिकवें हमें सवीकार है।। ऐ प्रकृति तेरी हवाएं हमें सुकून देती है। तेरी बेचैनी को हम बखूबी समझते हैं।। ऐ प्रकृति तू हमसे इतना नाराज़ क्यों है? माना हमसे… Read More

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संस्मरण : अरे बाप रे!

अरे बाप रे, आप तो कंचे खेलते हैं “क्यूं कंचे खेलना ग़लत है..? मैं तो ताश भी खेलता हूँ तब तो ताश खेलना पाप हो जाएगा हैना..?” क्या..? ताश भी खेलते हैं, कल का जुआ भी खेलेंगे हुंह! “तो क्या… Read More

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कविता : गुरुनानक जी

कार्तिक मास में संवत पन्द्रह सौ छब्बीस को माँ तृप्ता के गर्भ से कालू मेहता के आँगन तलवंडी, पंजाब (पाकिस्तान) में जन्मा एक बालक, मातु पिता ने नाम दिया था उसको नानक। आगे चलकर ये ही नानक सिख धर्म प्रवर्तक… Read More

suraj

गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ

1. किसान है क्रोध ••••••••••••••••• निंदा की नज़र तेज है इच्छा के विरुद्ध भिनभिना रही हैं बाज़ार की मक्खियाँ अभिमान की आवाज़ है एक दिन स्पर्द्धा के साथ चरित्र चखती है इमली और इमरती का स्वाद द्वेष के दुकान पर… Read More

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कविता : छठ पर्व

छठ तिथि शुक्ल पक्ष कार्तिक में, मनाया जाता ये अनुपम छठपर्व। सूर्यदेव की उपासना का पर्व यह, सौर मंडल के सूर्यदेव का है पर्व।। सूर्योपासना है सर्वश्रेष्ठ पर्व की, सूर्योपासना की थी अत्रि पत्नी ने। और श्रेष्ठतम इस व्रत को… Read More

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कविता : मोड़ा हुआ ‘किताब’ का पन्ना

कई महीनों से बल्कि साल के बराबर वैसे देखा जाए तो हमेशा से.. रैक में पड़ी किताबे जद्दोजहद करने के बाद भी, सड़को पर निकलकर सांस्कृतिक सामाजिक राजकीय विद्रोह कर पाने में नाकामयाब रही हैं। शायद, यह पूरी तरह सच… Read More

AmritaPoem

कविता : गंवारा न था

ये मेरे भीतर छिपी व्याकुलता ही है, जिसने मेरे स्वभाव में अधीरता को जन्म दिया है। माना मेरी बुद्धि संकीर्ण थी और बुद्धजीवियों के व्यापक परंतु, इस संकीर्ण ने ही ढांढस बंधा स्वयं को संभाला, विपरीत व्यथाओं मेँ हर-पल। प्रतिकार,… Read More