tum srijan ho

तुम सृजन हो
कवि के अंतर्मन का
शब्दों की दीपशिखा
और
छंदों के तार पे कसी
अलंकार से विभूषित
तुम सृजन हो
कवि के अन्तरमन का

तुझमें बहती हैं भावनाएं
नित कलकल
नदी सी निरन्तर
तुम हो वसंत ऋतु की
सुरभित उच्छवास
तुम सृजन हो
कवि के अंतर्मन का !!

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