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कविता : मोड़ा हुआ ‘किताब’ का पन्ना

कई महीनों से बल्कि साल के बराबर वैसे देखा जाए तो हमेशा से.. रैक में पड़ी किताबे जद्दोजहद करने के बाद भी, सड़को पर निकलकर सांस्कृतिक सामाजिक राजकीय विद्रोह कर पाने में नाकामयाब रही हैं। शायद, यह पूरी तरह सच… Read More

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कविता : चट्टान

ये चट्टान हैं… आजाद -ए- दौर की, इसे चाहे तुम कह दो जो तुम्हारे जी में आए खालिस्तानी, आतंकवादी जो तुम्हे सही लगे। जोड़ दो चाहे रिश्ता उनका चीन और पाकिस्तान से फिर भी उनके हौसले बुलंद हैं, उनके रगों… Read More