mansanti

पद्य : एक उस भगवन

मन-मग रहत , बस एक उलझन । हदय बस तब , चयन उस भगवन । जतन जब सरजन , अब अनवरत अर अनवरत । जग-जन चमन सद, बढ़त बस बरकत । ईश ,असलम , धन-धन ,सत-मदद । इस , उस… Read More

happy new year

हैप्पी न्यू ईयर

कोई कहता हैप्पी न्यू *Year* । कोई कहे अपना नहीँ *Dear* । अपने मन में क्यों हो *Fear* । कैलेंडर बदले है *Gear* । नया साल है बिल्कुल *Near* । दस्तक door पर करता वो *Hear* । दुखियों के हम… Read More

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लेख : सुंदर नगरी

सब कुछ समेटा जा रहा था , आंदोलन समाप्त हो चुका था । आंदोलन से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से जुड़े लोग भी अपने उन पुराने दिनों में लौटने की तैयारी में जुटे थे ,जिनको वो काफी पीछे छोड़… Read More

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ग़ज़ल : कभी ख्वाहिशों ने, फंसाया ज़िन्दगी को

कभी ख्वाहिशों ने, फंसाया ज़िन्दगी को ! तो कभी ज़रूरतों ने, रुलाया ज़िंदगी को ! कभी राह में गैरों ने बिछाए कांटे दोस्तो, तो कभी अपनों ने, छकाया ज़िन्दगी को ! कभी ख्वाबों में खुश हो लिए हम यूं ही,… Read More

शोध लेख : कवि केदारनाथ सिंह

मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दूँ…!!! घनानंद कहते हैं ‘लोग हैं लागि कवित्त बनावत/मोहिं तो मेरे कवित्त बनावत!’ लगभग यही स्थिति आधुनिक हिंदी कवियों में केदारनाथ सिंह की रही। उनकी कविताओं में कभी यह नहीं दिखा कि कवि ने कविता का… Read More

शोध लेख : साहित्य की सिनेमाई पटकथा रूपांतरण की समस्याएँ

‘साहित्य और सिनेमा का संबंध एक अच्छे अथवा बुरे पड़ोसी, मित्र या संबंधी की तरह एक दूसरे पर निर्भर है। यह कहना जायज होगा कि दोनों में प्रेम संबंध है ।”[1] – गुलज़ार साहित्य और सिनेमा दोनों ही ऐसे माध्यम… Read More

शोध लेख : भीष्म साहनी का नाट्य साहित्य सृजन और संदर्भ

प्रगतिशील चेतना संपन्न रचनात्मक भीष्म साहनी के नाटक, हिन्दी नाटकों के संसार में अपनी खास पहचान रखते हैं। यों उनके नाटकों में विद्यमान द्वंद्वात्मक वितान उनके कथा साहित्य में भी पूरी तौर पर समाया है। यही कारण है कि उनकी… Read More

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शोध लेख : अमृतलाल नागर की दृष्टि में ‘ सत्तावनी क्रांति’

1857 का समय भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। ये ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के अवध क्षेत्रों में चला। इस ‘सत्तावनी क्रांति’ का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी-छोटी… Read More

शोध लेख : आदिवासी पहचान और संस्कृति

अपने जातीय रूप की खोज करना, अपनी जातीय संस्कृति की मूल्यवान विरासत को पहचान और उस पर गर्व करना तथा अपनी जातीय संस्कृति के विकास के लिए अपने राष्ट्र को संगठित करने का संघर्ष चलाना। यह सब मानव समाज में… Read More

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व्यंग्य : लंका

“ना रूपया ना पैसा ना कौड़ी रे ये मोटू और पतलू की जोड़ी रे मोटू और पतलू रे” ये गीत गाते हुए प्रकाशक के लाये हुये लड्डू खाते हुए मोटू ने गब्बर स्टाइल में कहा – “अरे पतलू भाई ,… Read More