ऐ पूँजीपति कवियों! क्या तुम्हारी महँगी-महँगी और ब्राण्डेड डायरियों में ज़रा जगह नहीं लिखने को उनका नाम भी जिनकी समूची देह से अंग-अंग से लहू, पसीना, स्वेद-रक्त और आँसू पूरी तरह से, बुरी तरह से दूहे जा चुके हैं और… Read More
ऐ पूँजीपति कवियों! क्या तुम्हारी महँगी-महँगी और ब्राण्डेड डायरियों में ज़रा जगह नहीं लिखने को उनका नाम भी जिनकी समूची देह से अंग-अंग से लहू, पसीना, स्वेद-रक्त और आँसू पूरी तरह से, बुरी तरह से दूहे जा चुके हैं और… Read More
बच्चे बहुत अच्छे होते हैं तन, मन, वचन, आत्मा से बहुत सच्चे होते हैं प्रेम-सद्भाव के वृक्ष-आम के कोमल डालियों की तरह सदा झुके होते हैं कच्चे-पक्के फलों की तरह लदे होते हैं यदि मिलनसार की भाषा सीखना है तो… Read More
कवि हमेशा सीमाएँ तोड़ता है, वे चाहें जिस भी प्रकार की हों— राजनीतिक, समाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका काम नहीं चलता, इसलिए वह सामाजिक नियमों में आसानी से बँध जाता है। यहाँ… Read More
हे मेरे ईश्वर, ओ माय गॉड,ए मेरे मालिक, या खुदा। हाथ उठाऊं, अरज करूँ मैं, ढूँढ़ू तुझको मैं कहाँ कहाँ। मन्दिर में ढूँढा तो मिली बस तेरी मूरत थी प्यारी। गिरजे का घण्टा बजा मैं थाका तेरी शान थी न्यारी।… Read More
हाथ से छिटले हुये रिश्ते नहीं झुठला रहा हूँ, वक़्त की सीढ़ी बड़ी बोझिल, जरा घबरा रहा हूँ। कुछ हैं अच्छे लोग, कुछ हैं ऐसे लोग जिनको, और अपना मानता था, खैर! धोख़े खा रहा हूँ । हाँ किसी जन्नत… Read More
जो लोग कल में, आज को ढूंढते है। और खुद कल में जीते है, वो बड़े बदनसीब होते है। क्योंकि कल जिंदगी में, कभी आता ही नही। इसलिए में कहता हूं, की आज में जीकर देखो। जिंदगी होती है क्या,… Read More
आज मैंने उस बहती नदी को समीप से देखा जो हर रोज पड़ती है मेरे अध्व में…… मैं गुजर जाती हूं अपने जीवन की सूझ बूझ में उलझी उलझी….. मगर शायद आज नियति में था उससे मिलना वो वैसी बिल्कुल… Read More
ये धान के पकने का सुन्दरतम मौसम है इस मौसम में हल्की-फुल्की, कुछ ठण्डी-ठण्डी हवा-बतास बहेंगी धान के सोने जैसे बालियों में धीरे-धीरे कोटि-कोटि दूधदार चावल आएँगे मिट्टी की सुकोमलता पाकर सूरज की किरणों से नई-नई शक्ति मिलकर धीमी आँच… Read More
कभी अपनो ने लूटा कभी गैरो ने लूटा। पर में लुटता ही रहा। इस सभ्य समाज में।। किससे लगाएँ हम गुहार, जो मेरा दर्द समझ सके। मेरे ज़ख़्मों पर, मलहम लगा सके। और अपनी इंसानियत, को दिखा सके। और मुझे… Read More
चलो उस ओर, जहां सूरज निकलता है। पंख फैलाएँ, बिना रुके, बिना ठहरे। चलो उस ओर, जहां ऊर्जा-प्रकाश मिलता है। उम्मीद की किरणों से, हमारा मन प्रभावित होगा। ऊर्जा रूपी प्रकाश से, हमारा चेतन प्रकाशित होगा। प्रतिपल बढ़ता हमारा कदम,… Read More