पुस्तक समीक्षा : विज्ञप्ति भर बारिश में समय के संक्रमण से जूझती कविता

हिन्दी साहित्य आदिकाल से लेकर आज तक के दो हज़ार वर्ष से भी अधिक का एक दीर्घकालिक समयांतराल पार कर चुका है। इस दौरान इसमें कई आंदोलन हुए, कई विचारधाराओं ने जन्म लिया तथा अपनी साँसें स्वर्णिम इतिहास के रूप… Read More

कविता : जीवन ही पूरा महक जाय जब साथ हो सच्चा मित्र

कुछ पल के लिये कपड़ों को महका देती है इत्र पर जीवन ही पूरा महक जाय जब साथ हो सच्चा मित्र बसा हो कैसा मन में हमारे गलत भाव या दोष भले कभी भी दिखा दे हम उस पर अपना… Read More

कविता : शान्त का श्रेष्ठ प्रदर्शन

उपकार करो निश्छल हो जग में फिर भी डरना पड़ता है इंसानी बस्ती में इंसानों को,इंसानों से डरना पड़ता है दूध पिलाओ,चमर हिलाओ, सर्वस्व थमा दो तुम उसको फिर भी गर काटे दौड़े तो, फन एड़ी से रगड़ना पड़ता है… Read More

गाँधी : स्त्री-विमर्श के पैरोकार

मोहनदास करमचंद गांधी एक ऐसी शख्सियत है जो किसी परिचय के मोहताज नहीं, बल्कि देश – विदेश  में भारतीयों का परिचय इनके नाम से किया जाता है। कितने ही वाकया हैं जिसमें देश से विदेश गए लोगों से विदेशी यह… Read More

गांधी जयंती : विशेष

(1) बापू फिर आओ एक बार  हर वर्ष सजोया यादों में बापू का प्रिय जन्मदिवस हर वर्ष किया संकल्पित खुद को बार बार बापू के आदर्शों को जीवन-दान मिले जनके अन्तः कोलाहल से उठती पुकार। पर त्याग हीन सत्ता की… Read More

इस देश की पहचान अब ‘कलाम’ बने

(मित्रों, मैंने यह रचना डॉ. कलाम के प्रमुख सिद्धांतों से प्रभावित होकर लिखी है इसलिए इसमें बहुत सी ऐसी बातें हैं जो सामान्य होते हुए भी सामान्य नहीं है। जिसे मैंने कुछ बिन्दुओं को निर्धारित करते हुए आप सब तक… Read More

बुक रिव्यू : हाशिये के लोगों में झाँकती : किन्नर समाज संदर्भ ‘तीसरी ताली’

यह पृथ्वी अनेक विचित्रताओं से युक्त है। और उतना ही विचित्र और रहस्यों स युक्त हैं यह ब्रह्मांड, उसके चराचर जीव जगत। मनुष्य का जब से जन्म अथवा उद्भव हुआ है तब से लेकर अब तक उसने कई आविष्कार किए… Read More

ख़ामोश क़त्ल

देखो उस मेट्रो को… कैसे खिलखिला के हँस रही है… सुना है, इसने कई पेड़ों का क़त्ल कर दिया कल रात… कल रात जब हम गहरी नींद में थे कुछ पेड़ सुबक रहे थे अंधेरे में… कइयों ने आवाज़ लगाई… Read More

पिता का विश्वास

रिया की उम्र अब 18 की हो चुकी थी, जहाँ एक ओर रिया की माँ को उसके ब्याह की चिन्ता सता रही थी वहीं रिया के पिता इस दुविधा मे फंसे हुए थे कि अपनी धर्मपत्नी की चिन्ता को दूर… Read More

ग़ज़ल : क्या करेगा आदमी

पत्थरों के इस शहर में आइने-सा आदमी, ढूँढने निकला था खुद को चूर होता आदमी। चिमनियाँ थीं, हादसे थे, शोर था काफी मगर, इस शहर की भीड़ में कोई नहीं था आदमी। तन जलेगा, मन जलेगा, घर जलेगा बाद में,… Read More