बंदूकें तुम्हें भले ही भाती हो अपने खेतों में खड़ी बंदूकों की फसल लेकिन- मुझे आनन्दित करती है पीली-पीली सरसों और/दूर तक लहलहाती गेहूं की बालियों से उपजता संगीत। तुम्हारे बच्चों को शायद लोरियों सा सुख भी देती होगी गोलियों… Read More
बंदूकें तुम्हें भले ही भाती हो अपने खेतों में खड़ी बंदूकों की फसल लेकिन- मुझे आनन्दित करती है पीली-पीली सरसों और/दूर तक लहलहाती गेहूं की बालियों से उपजता संगीत। तुम्हारे बच्चों को शायद लोरियों सा सुख भी देती होगी गोलियों… Read More
साहित्य के वाद (छायावाद, प्रगतिवाद) से परे के कवि रामधारी सिंह दिनकर की आज 111वीं जन्म जयंती है। 23 सितम्बर 1908 सिमरिया में जन्में और साल 1974 की 24 अप्रैल को पंचतत्व में विलीन हो जाने वाली इस महान विभूति… Read More
स्त्री फँसायेगी तुम्हें जाल में फंसना मत यही सिखाया गया है नरक का द्वार जो है मेनका का काम ही है आप जैसे तपस्वियों का तप भंग करना आप बहक गये तो क्या इंसान ही तो हैं आखिरभोले भाले लोग….… Read More
हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना और संस्कृति के संवाहक लेखकों और कवियों की परंपरा में ‘रामधारी सिंह दिनकर’ का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। आज इस महान विभूति का जन्मदिवस (23 सितंबर 1908- 24 अप्रैल 1974) है।… Read More
ढाई आखर का शब्द ‘प्रेम’ विश्व साहित्य में शायद सर्वाधिक चर्चित या कि विवादित रहता आया है। पुराख्यानों से लगायत अधुनातन साहित्य तक काव्य और कथा सर्जना के केन्द्रीय तत्व के रूप में प्रेम को व्यापक स्वीकृति एवं अभिव्यक्ति मिलना… Read More
मेरी बेटी, मेरी जान ! तुम सर्दी में इतनी सुंदर क्यों हो जाती हो मेरी बेटी गोल-मटोल स्कार्फ बांध कर नन्हीलाल चुन्नी जैसी नटखट क्यों बन जाती हो मेरी बेटी मेरी बेटी, मेरी जान, मेरी भगवान, मेरी परी, मेरी आन,… Read More
यह दोनों गीत 1987 में लिखे गए थे । इन गीतों की एक पृष्ठभूमि थी । डॉ. धर्मवीर भारती ने इन दोनों गीतों को धर्मयुग के 15 मार्च 1987 अंक में पृष्ठ 19 पर छापा था । आज पत्रिकाओं के… Read More
हे कूल डूड ऑफ़ हिंदी, टुडे इज द बर्थडे ऑफ़ हिंदी, ईट्स आवर मदर टँग एन प्राइड आलसो, सो लेटस सेलेब्रेट। यू आर कॉर्डियाली इनवाटेड।लेट्स मीट एट 8 पीएम, इंडीड देअर विल भी 8 पीएम, वेन्यू ब्लैक डॉग हैंग आउट… Read More
मैं तुझसे मोहब्बत का इक़रार करता हूँ। क्या कहती हो जानम, मैं तुझसे प्यार करता हूँ। निगाहें ना झुकाना, नजरें न चुराना । आ जाओ सनम मैं तेरा इंतजार करता हूँ। आँखों की सूरत अब दिल में बसाता हूँ। जिसका डर… Read More
मेरे गाँव की धरती, रूठी-एकांत सी बैठी है। नित्य होते देख गाँव से शहर को पलायन, कुछ ठगी-ठगी, हैरान-परेशान सी बैठी है। लहलहाती खेतो में, निरस-उदास सी बैठी है। मुस्कुराती खिली कालियो में, बेबस-मुरझाई सी बैठी है। कल-कल नदी की… Read More