गाँव के लगभग दस लोगों से पूछने और पूरे गाँव की तंग गलियों में भटकने के बाद आखिरकार वह खपरैल का मकान मिल ही गया. घर के ठीक सामने ही एक बूढी औरत अलाव जलाने के लिए पुआल में थोड़ी सी आग रखकर फूंक मार रही थी. बार-बार फूंक मारने के बाद भी सिर्फ धुआं ही निकल रहा था, आग नहीं जल रही थी. उन्हें देखकर मुझे लगा आग जलाने की भी एक उम्र होती है. मैं उनके पास जाकर रुका और लगभग झुकते हुए उनके पैरों को छूकर बोला- “दादी नमस्ते ! मैं भलुआ गाँव से आया हूँ… लाइए आग मैं जला देता हूँ.”

जबाब में वह मुझे एक टक देखते हुए बोलीं- “कहाँ घर है बाबू! वलुआ?”

“नहीं-नहीं,  भलुआ”- मैं तेज फूंक से एक ही बार में आग जलाने के बाद झट से बोल पड़ा.  

फिर वे न जाने क्या सोचते हुए वहां से उठीं और घर के अन्दर चली गयी. मैं हैरान तो हुआ, लेकिन ठण्ड से कठुआए अपने हाथों को आग से सेकना पहले जरूरी समझा, इसलिए आग-तापने(आग पर हाथों को सेकना)लगा.    

कुछ समय बीत जाने के बाद, जब वह बूढी औरत मकान से नहीं निकली, तो मेरे दिमाग में अनायास ही तरह-तरह की उलझने पैदा होने लगीं. सोचने लगा- ‘कहीं मैं दूसरे के घर तो नहीं आ गया ? या वे मुझे पहचान नहीं रही है ? लेकिन मैं तो पिताजी के बताये मुताबिक सही पते पर ही पहुंचा हूँ.’

तरह-तरह के प्रश्न में दिमाग को भेद ही रहे थे कि तभी वह बूढी औरत एक प्लेट में बिस्कुट और जग में पानी लेकर मेरे पास हाज़िर हुई. उन्हें देखकर मेरे कंप्यूटर की तरह चल रहे दिमाग को कुछ राहत मिली. ये सारे विचार मेरे मन में इसलिए आ रहे थे; क्योंकि मैं यहाँ पहली बार आया था. और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि, यह रिश्तेदारी बहुत पुरानी थी. मेरे दादा के समय की. इसलिए न कोई मुझे पहचान रहा था और न ही मैं किसी को…..

“लो बाबू पानी पी लो… “-और आग के पास ही बैठ गयी.  

मैं प्लेट से एक बिस्कुट उठाया और खाते हुए बोला- “दादी घर पे कोई है नहीं क्या”?

“सब लोग खेत में गए हैं… खाने-पीने के टैम तक आ जाएगे.”

“अच्चा-अच्छा…!”

“तू भनमतिया के नाती हो न… ओकर का हाल-चाल है ?”

“ठीके है… लेकिन आजकल थोडा ज्यादे बीमार रहती हैं… दमा कभी-कभी धर के दाब देता है तो सांस भी नही ले पातीं”

मेरी दादी का नाम भानमती है. उन्होंने ही बताया था यहाँ एक बहुत पुरानी रिश्तेदारी है. बहुत दिन हो गया, अब कोई भी एक दूसरे के यहाँ आता-जाता नहीं है. जबकि एक जमाने में इतनी घनिष्ठता थी कि दोनों घर-परिवारों के बिना कोई भी कार्यक्रम नहीं होता था. दादी ने ही मुझे बताया  कि यहाँ के परिवार में एक लेखपाल बाबू थे. उनकी अपने यहाँ पर भी बहुत सारी जोत की जमीन थी. लेकिन उनका परिवार यहाँ नहीं रहता था. हमलोग ही उनके जमीन जायदाद की देखभाल किया करते थे. बड़े ही नेकदिल इंसान थे वे. चकबंदी के समय वे यहाँ की अपनी सारी जमीन तुम्हारे पिता के नाम कर दिए थे. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन तुम्हारे दादा से बाद के दिनों में किसी बात को लेकर उनसे अनबन हो गयी और तभी से दोनों परिवारों के बीच आना-जाना ऐसा बंद हुआ कि आज हमें ये तक नहीं पता कि अब वे जीवित भी हैं या नहीं. मेरी बड़ी इच्छा थी कि उनसे एक बार उनके घर जाकर पूरे परिवार से मिलूं, लेकिन बिमारी की वजह से लगता है कि मेरी इच्छा धरी की धरी रह जायेगी… बेटा अब तो तुम बड़े हो गए हो कम से कम एक बार तुम्ही चले जाते… तुम्हे पता है वे तुम्हे देखकर कितना खुश होंगे !

दादी की उस इच्छा की वजह से ही मैं यहाँ आया था. इस बीच में अलाव के पास बैठी दादी मेरे और घर के बारे ढेर सारी बातें की. मुझे देखकर वे बहुत खुश थीं       

धीरे-धीरे सूर्य आकाश में अपनी लालिमा विखेरते हुए धरती की गोद में समा गया. गाँव में चारो तरफ लगभग हर घर के ऊपर से धुआँ उठता दिखाई दे रहा था. जाहिर था कि रात के भोजन के लिए औरत घर में चूल्हा जला रही थी. उधर सारे पक्षीगण चहचहाते हुए अपने बच्चों का भोजन लिए हुए अपने-अपने घोसलों में आने लगे. इस तरह हम लोगों के चारों तरफ अँधेरा छा गया.

कुछ देर बाद घर के अन्दर से मुझे खाने के लिए बुलावा आया. मैं वहां से उठा और जूते खरखटाते हुए घर के अन्दर चला गया. घर के अन्दर जाने के बाद सबसे पहले मैं चाची को प्रणाम किया, जो खाना पका रही थीं. वही पास में खड़ी एक पंद्रह-सोलह वर्षिय लड़की ने झुककर मेरे पैरों को छुआ, जवाब में मैं उसे केवल देखते ही रह गया. उसका नाम अनुराधा था. लेकिन सब उसे अनु ही कह रहे थे. उसने ही मुझे खाना-पानी सब लाकर दिया.

जब मैं खाना खा लिया तो अनु मुझे एक कमरे में ले गयी और बोली- “आपको यहीं सोना है” मैं उसे बस देखते ही जा रहा था मानो मेरी आखों में ही आकर बस गई हो. मेरे इसतरह से देखने और कुछ न बोलने के बाद भी वह अपने अधरो पर हंसी विखेरती हुई, कमरे से बाहर चली गयी. उसके जाने के बाद मैं कमरे का निरीक्षण करने लगा.  कमरा हरे रंग से रंगा गया था. दीवाल पर कुछ देवी-देवताओं तथा कुछ महापुरुषों की तस्वीरें टंगी थी. बगल में एक ट्यूबलाइट जल रहा था जो कमरे में उजाले का कारण था. कमरे के निरिक्षण के दौरान ही मेरा ध्यान, एक किनारे में लगे बिस्तर पर रहे एक बुजुर्ग पर गया, जो पासपोर्ट बनवा लिए थे. उन्हें देखकर मुझे लगा, वे यमराज के पास जाने के लिए वीसा का इन्तजार  कर रहे हों.

मैं उनके पास जाकर उनके पैरों को छूते हुए प्रणाम की औपचारिक पूर्ति किया. जवाब में वे शायद मुझसे कुछ कहना चाहते थे. लेकिन अफ़सोस की वे कुछ बोल नहीं पाए क्योंकि वे बोल नही पा रहे थे. इस लिए वे मुझे देखकर आँखों से ही आशीर्वाद दिया जिसे मैंने महसूस किया. तभी अनु का कमरे में प्रवेश हुआ-“अगर किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो वेझिझक मांग लीजियेगा.”

मैं शायद इसी समय की ताक में था- “अनु, इधर सुनो”

क्या है? वह मेरे पास आकार बोली

“कोई किताब या पत्रिका हो तो मुझे लाकर दे दो.

“अभी लाती हूँ”- वह दौड़ते हुए कमरे से बाहर चली गयी.

वह जब लौटी तो उसके साथ में दो उपन्यास और दो-तीन पत्रिकाएं थीं. –“इसमें से जो अच्छा लगे वो ले लीजिये”

“एक काम करो… सभी रख दो”

जब वह जाने लगी मैं उसे धन्यवाद देते हुए ‘गुड नाईट’ बोला.

“गुड नाईट”-वह शर्माते हुए कमरे से बाहर चली गयी.

उसके जाने के बाद मैं जूते और कपड़े निकाल कर आराम से बिस्तर पर लेट गया और एक उपन्यास निकाल कर पढ़ने लगा. पढ़ते-पढ़ते न जाने कब नींद आई पता ही न चला.

करीब रात के तीन बजकर कुछ मिनट हो रहे थे, कि मेरे कानों से एक आवाज़ टकराई. मैं तुरंद निद्रा से जगा और देखा कि अनु अपने दादा को आवाज़ दे रही है. मैं उठ कर बैठ गया. दादा जी के नाक के रस्ते से जा साँस बंद हो चुकी थी लेकिन मुह से तेज खर्राटे की आवाज के साथ हवा बाहर-भीतर आ-जा रही थी.

उनके सिरहाने बैठी दादी धीरे-धीरे सिसकिया भर रही थी, तथा दूसरी तरफ बैठी चाची, दादा जी के मुह में गंगा जल और तुलसी पत्ता डाल रही थीं. पास में ही तीन-चार औरतें और भी थीं, जिन्हें मैं नहीं जानता था. वे आपस में कानाफूसी कर रही थीं. तभी मेरे मन में भी कुछ हलचल पैदा हुयी और बड़े ही आत्मविश्वास के साथ मेरे मन ने मुझसे कहा कि ‘यमराज आज लगभग सात बजे के आस-पास आयेंगे.’ मुझे लगा यमराज ने मुझे खुद आकर यह सूचना दिए हों. लेकिन यह बात मैं किसी और से नहीं कह सका.

धीरे-धीरे वहां भीड़ इकठ्ठा होने लगी. जो भी भीड़ में शामिल होता; चाहे औरत हो या मर्द, दादा जी को प्रणाम जरुर करता. उन्हें देखकर मैं भी उन्हें मन ही मन प्रणाम किया. तभी एक आदमी मेरे हाथों में सुन्दर कांड की एक किताब देकर दादाजी को पढकर सुननाने के लिए कहा. मैं तनिक भी देरी न करते हुए बाहर जाकर हाथ-पैर धोया अपने ऊपर हाथों में पानी लेकर छिड़क दिया (गाँव में लोग इसे चिरयिया स्नान कहते हैं ) और किताब लेकर मन को एकाग्रचित करते हुए जोर-जोर से सुन्दर-कांड पढ़ने लगा.

“आप पहले चाय पी लीजिये उसके बाद पढियेगा”- वह अनु की आवाज थी. उसके हाथों से चाय का प्याला लेकर उसकी आखों में झाकना चाहा लेकिन उसने अपनी आखों को ऐसे छुपा लिया जैसे चाँद बादल में छुप जाता है और बिना मुस्कुराये  कमरे से बहार चली गयी.

चाय के बाद मैं फिर से सुन्दर कांड पढ़ने लगा और जल्दी से समाप्त किया. फिर हनुमान जी को प्रणाम करके कमरे से बाहर चला गया. वहां भीड़ इकट्ठी थी. उसमे लोग तरह-तरह की बातें करते हुए अपने में मग्न थे. मैं वहीं खड़ा हर किसी की हर तरह की बाते सुनने लगा. तभी घर के लोग तेज़ आवाज़ में रोने लगे. उसी समय मेरा ध्यान अचानक ही घड़ी की तरफ चला गया. ठीक सात बजकर 10 मिनट हो रहे थे. मैं शांत भाव से सावधान मुद्रा में खड़ा हाथ जोड़कर नत मस्तक होते हुए यमराज को प्रणाम किया और एकाएक ही मेरी ऑंखें जल मग्न हो गयी. मुझे इस बात का एहसास हुआ कि हो न हो दादा जी मेरा ही इन्तजार कर रहे थे. मुझे देखने के बाद वे जरुर सुकून से मरे होंगे. 

बाहर खड़े सब लोग दादा जी के पास चले गए. दादा जी का निर्जीव शरीर कमरे से बाहर निकाल गया. उसके बाद कुछ लोग बांस काटने के लिए भागे, तो कुछ ने जाकर ट्राली का इंतजाम किया. चाचा ने मुझे एक कागज (जिसपर बैंड बाजा वाले पता लिखा हुआ था) और कुछ पैसे देते हुए बोले-“चौराहे से अंग्रेजी बैंड वालों को बुला लाओ.”

मैं साईकिल लेकर चौराहे पर गया और बैंड वाले को बुला लाया.

करीब ग्यारह बजे बाबा की अर्थी चलने के लिए तैयार थी. कुछ ही देर में उनकी आखिरी बारात भी निकलने लगी. आगे-आगे बैंड वाले चल रहे थे, पीछे-पीछे उनका जनाजा, उनके पीछे घर और टोले-मोहल्ले की कुछ औरतें फूल अक्षत की वर्षा कर रही थीं.

मैं भी दादा जी की डोली को कन्धा दे रहा था. उनकी अर्थी गावं के सिवान पर जाकर रुक गयी.  फिर वहां से साथ में गयीं सब औरतें उनको प्रणाम करके घर लौटने लगीं. तभी चाची ने मुझसे कहा कि “बाबू आज गाँव मत जाइयेगा.” मैंने सहमति में सिर भर हिला दिया. फिर उनके शव को ट्राली पर लादकर हमलोग गंगा नदी के लिए खाना हो गए.

चार घंटे का सफ़र तय करने के बाद, हम लोग गंगा नदी के किनारे स्थिर शमसान घाट पर पहुचे. श्मशान का दृश्य देख कर मैं हतप्रभ रह गया. वहां लगभग पांच छः लाशें जलाई जा रही थी. मैं अपने आपको डरा सा महसूस करने लगा. क्योंकि मैं पहली बार श्मशान घाट पर गया था.

नदी के उस पार दूर तक रेत ही रेत था. जिस पर वहां के लोग तरबूज, खीरा, कांकर के पौधे लगाए थे. श्मशान घाट की ज़मीन चिताओ के जलाने से कोयले की तरह काली हो गयी थी. कुछ ही छड़ों में दादा जी की चिता सज गयी. फिर चाचा जी ने हिन्दू धर्म के नियमानुसार उसमे आग लगा दी. चिता घू घू कर जल उठी.

उधर धीरे-धीरे सूर्य के दिन की लीला समाप्त होने लगी. पक्षी गण आकाश के रास्ते अपने-अपने घर को लौटने लगे. नदी में जो सूर्य की लाल किरणें चमक रही थी, धीरे-धीरे समाप्त हो गयी. कुछ ही देर में हम लोग कालरात्रि के आगोश में समा गए. चिताओ के जलने के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.

चाचाजी ने एक आदमी को कुछ रुपये देकर कहा- “आप लोग तुलसी घाट पर जाकर स्नान करके नास्ता-पानी कीजिए… थोड़ी देर में हम लोग भी आ रहे है. फिर वे लोग ट्रेक्टर-ट्राली लेकर वहां से चले गए. यहाँ पर कुल मिलाकर हम पांच लोग रह गए थे.

कई चितायें घू-घू करके जल रही थी. वहां का दृश्य बहुत डरावना लग रहा था. नदी में छप-छप, कल-कल की आवाज़ आ रही थी. कभी-कभी तो नदी में किसी के कूदने की भी आवाज़ आ जाती.  

हम लोग वहां शांत भाव से चुपचाप बैठे चिता के जल जाने का इंतज़ार कर रहे थे. वहीं दूसरी चिता की तरफ जो कि अधिकतर नौजवान थे. बहुत हो हल्ला कर रहे थे. तरह-तरह की उटपटांग बातें करते हुए खूब ज़ोर-जोर से ठहाका लगा रहे थे, गोया दाह-संस्कार में नही बल्कि किसी रंगमहल में नाटक देखने आये हों.  

रात के करीब दस बजे चिता जलकर स्वाहा हो गयी. चाचाजी ने उनकी अस्तियों की राख को घड़े में डालकर गंगा लाभ दे दिया. उसके बाद हम लोग पैदल ही गंगा घाट की तरफ चलना शुरू कर दिए. तभी दूसरी चिता वाले भी अपनी ट्राली पर चढ़ने लगे. उन्हें देखकर मैं बोल पड़ा- “चाचाजी, क्यों न हम लोग भी उन्हीं की ट्रोली से चल चले. आखिर वे लोग भी तो वहीं जायेंगे.”

मेरे सुझाव से सब लोग सहमत हुए और हम उनकी ट्राली की तरफ बढ़ चले. मैं ज्यों ही ट्रोली पर चढ़ना शुरू किया तभी मेरे ही उम्र का एक लड़का मुझे पीछे से धक्का दे दिया. जिससे ट्रोली से लड़कर मेरा एक दांत टूट गया.

मैं भी कम न था क्योंकि उन दिनों अखाड़े में कुश्ती लड़ा करता था, इसलिए आव देखा न ताव झट से उस लड़के की एक बांह पकड़ा और धोबिया-पाठ दे मारा. वह इतना तेज गिरा कि उसके मुह से चीख निकल गयी. अब वह चारो खाने चित धरती पर पड़ा था.

उसके गिरते ही मेरे मुह से गली निकली- “साले… पीछे से धकेलता है?” उसे एक लात जमाने के लिए अपना पैर उठाया ही था कि किसी ने मुझे खींच लिया. फिर क्या था दोनों पक्षों में गरमा-गरम बहस और गाली- गलौज शुरू हो गया.

हल्ला सुनकर दूसरी चिता जला रहे लोग भी यहाँ आ पहुंचे और दोनों पक्षों को समझाते हुए झगड़े को शांत किया. फिर हमलोग पैदल ही गंगा घाट की तरफ चल दिए. चलते समय एक आदमी जिसकी बड़ी-बड़ी मुछे थी, ने मेरी पीठ थपथपाते हुए मुझे शाबाशी दी- “वाह बेटे ! तुमने तो कमाल कर दिया. इतनी तेजी से पटखनी दी कि अँधेरे में कोई तुम्हे पहचान भी नहीं पाया.”

“करता भी क्या… साले ने मेरी एक दांत जो तोड़ दी.”- मेरे सीने में उस समय लगभग एक इंच के फुलाव था.

कुछ ही देर में हमलोग सोर्ट-कट रास्ते से तुलसी घाट पहुँच गए. फिर जल्दी-जल्दी कपड़े निकाल कर नदी में स्नान करने लगे. तभी वे लोग भी अपनी ट्राली से वहां पहुंचे और वहां घाट पर खड़े लोगों को दूर भागने लगे.  

अब हमलोग नदी से बाहर निकल कर अपने कपड़े बदल रहे थे. तभी वहीँ पास में खड़े एक बुजुर्ग आदमी ने उन लोगों से पूछा- “तुम लोग हमे यहाँ से क्यों भगा रहे हो?”

“क्योंकि हमलोग गंगा में नंगे नहायेंगे.”- इतना कहकर उस बुजुर्ग को धक्का दे दिया और अपने-अपने कच्छे और बनियान निकालकर गंगा जी में नंगे ही कूद पड़े.

उनकी बत्तमीजी देख वहां खड़े अन्य लोग हैरान और लाचार थे. तभी मेरा ध्यान नदी में से उठ रही छप-छप की आवाज की तरफ गया. मैं झट से झोले में रखा टार्च निकला और उस तरफ जला दिया. टोर्च के उजाले में दिखा दृश्य देखकर सब आश्चर्य चकित हो गए. आश्चर्य होना स्वभाविक ही था क्योंकि वह दृश्य ही ऐसा था.

नदी के पानी में अचानक एक आकृति उत्पन्न हुयी जिसके शरीर पर सफेद कपडे थे. शायद वह कोई युवती थी तेजी से नदी में तैरते हुए दूसरे किनारे की तरफ जाकर अदृश्य हो गयी.

जिसने भी उसे देखा वह तरह-तरह की अपनी धारणा बनाने लगा. लोगों की क्या धारणा थी मुझे नहीं पता लेकिन मेरे मन में यही ख्याल घर कर गया कि हो न हो कहीं गंगा जी भी उन लोगों की बतमीजी सहन नहीं कर सकीं और इस किनारे से उस किनारे चली गयीं.  

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