कविता : सावन की देखो रिमझिम आयी

सावन की देखो रिमझिम आयी ! यारो तपती धरती अति हर्षायी ! सब उफन उठे हैं नद और नाले, खग चहक रहे हो कर मतवाले, उत करें मयूरा नर्तन अलवेला,   जित देखो उत पानी का रेला, यारो झट से गरमी… Read More

kavita kavi nahi wah abhinata hai

कविता : कवि नहीं वह अभिनेता है

कुछ लोगों को लगता है कि वह एक कवि है क्योंकि वह कविताएँ लिखता है परंतु कविताएँ लिखी नहीं जातीं उनका तो जन्म होता है कविताएँ उन्मुक्त होती हैं किंतु वह उन्हें बाँधकर रखना चाहता है अपनी संकीर्ण मानसिकता की… Read More

poem ji nahi sakta me akele

कविता : छोड़ो भेद – व्यवधान

जी नहीं सकता मैं अकेला जी नहीं सकते तुम अकेले जी नहीं सकता कोई अकेले इस मानव जग में चलना है .. चलना है… मिलजुलते – प्यार करते एक दूसरे से और मानते एक दूसरे को सहयोग अदा करते परस्पर… Read More

poem phir tandav karna hoga

कविता : फिर तांडव करना होगा

हे नारी ! आखिर कब तक सहेगी तू , अबला बन, प्रताड़ित होती रहेगी तू , बहुत हो चुका, दूसरों के लिए जीना मरना , अब तो तुझे खुद के लिए लड़ना होगा माँगना नहीं अधिकार, तुझे छिनना होगा, दिखला… Read More

poem sayd wahi payar hai

कविता : शायद वही है प्यार

रातों को जब नींद ना आये, दिल का चैन भी कहीं खो जाये, याद आये कोई जो बारम्बार, शायद वही है प्यार। आँखों में खुमारी सी छा जाये, सपनों में केवल वो ही वो आये, हर पल रहे जिसका इंतज़ार,… Read More

parinam poem

कविता : परिणाम

खेल खेलो ऐसा की किसी को समझ न आये। लूट जाये सब कुछ कोई समझ न पाए। कर्ताधर्ता कोई और है पर दाग और पर लग जाये। और मकरो का रास्ता आगे साफ हो जाये।। देश का परिदृश्य अब बदल… Read More

poem wo dekhti hai sapne

कविता : वो देखती है सपने

वो देखती है सपने, रात रात भर जाग के, चाँद तारों को आसमां में निहारते, वो देखती है सपने । वो देखती है सपने, अपने पिया से मिलन के, अपने विह्वल मन को समझाते, वो देखती है सपने । वो… Read More

poem kargil vijay diwas

कविता : कारगिल विजय

सन् निन्यानवे था थी वो माह जुलाई शत्रु से हमारी पुनः छिड़ी हुई थी लड़ाई मार रहे थे शत्रुओं को हमारे वीर महान् राष्ट्र की रक्षा हेतु दे रहे थे बलिदान दिन सोमवार था वो तिथि छब्बीस जुलाई कारगिल पर… Read More

poem koi sikayat nahi

कविता : कोई शिकायत नहीं

हंसनेवालों को हंसने दो यह नयी बात तो नहीं अपने रास्ते पर चलनेवालों को मैं फिसलता हूँ, गिरता हूँ लड़खड़ाता हूँ तो क्या विचारों की दुनिया में एक स्वतंत्रता है, अंतर्वस्तु है मेरी सामाजिक चिंतन में समर्पित हूँ अपना कुछ… Read More

mukatak jamana lekhan hunar

मुक्तक ज़माना, लेखन और हुनर

ज़माना “हम सब ज़माने की शर्तों पर चल रहे है, जैसे पान में कत्थे के संग चुना मल रहे है, वक़्त बदला नही है किसी का अभी तक, लेकिन हम सब वक़्त के साथ बदल रहे है।” लेखन “अभी लेखन… Read More