mahamanav bano

कविता : महामानव बनो

विश्व चेतना के बीज हे मनुष्य ! अंकुरित होने दो तुम्हारे निर्मल चित्त में लहलहाती फ़सलों की सरसराने दो, स्वेच्छा वायु से बचाते रहो अपनी रौनक को मूढ़ विचारों से, बौद्धिक चेतना का हरियाली तुम बनो अनवरत साधना में सत्य… Read More

poem ji nahi sakta me akele

कविता : छोड़ो भेद – व्यवधान

जी नहीं सकता मैं अकेला जी नहीं सकते तुम अकेले जी नहीं सकता कोई अकेले इस मानव जग में चलना है .. चलना है… मिलजुलते – प्यार करते एक दूसरे से और मानते एक दूसरे को सहयोग अदा करते परस्पर… Read More

poem koi sikayat nahi

कविता : कोई शिकायत नहीं

हंसनेवालों को हंसने दो यह नयी बात तो नहीं अपने रास्ते पर चलनेवालों को मैं फिसलता हूँ, गिरता हूँ लड़खड़ाता हूँ तो क्या विचारों की दुनिया में एक स्वतंत्रता है, अंतर्वस्तु है मेरी सामाजिक चिंतन में समर्पित हूँ अपना कुछ… Read More

poem chalne to mujhe

कविता : चलने दो मुझे

जलता हूँ मैं अपने आपमें अक्षर बन जाता हूँ नित्य प्रज्ज्वलित ज्वाला मेरे बनते हैं अक्षर प्रखर असमानता, अत्याचारों के विरूद्ध आवाज़ बनकर आते हैं ये मेरे प्रखंड प्राणाक्षर पंचशील का हूँ मैं साधना में अल्प की दृष्टि से देखो… Read More

poem bolta hu mai

कविता : बोलता हूँ मैं

मैं समाज से बोलता हूँ दुनिया से बोलता हूँ मनुष्य से बोलता हूँ मेरे पास वह शक्ति नहीं उन भेड़ियों से बोलने का कुटिल तंत्रों के साथ लड़ने का होने दो मुझ पर इनके नादान परिहास रचने दो मंत्र –… Read More

kavita wah janta hi nahi

कविता : वह जानता ही नहीं

बकरे को उसने बड़ी दुलार से पाला – पोसा किया विश्वास की कोमल जगह पर उसे बलि चढ़ा दी निर्ममता से, मालिक का यह दुलार नाटक वह नादान जान नहीं पाया उसके हर बात को वह मिमियाता रहा, सिर हिलाता… Read More

poem manaw es jag me

कविता : मानव जग में

कभी – कभार हम अपनों से, अपना समझनेवालों से भी पराये हो जाते हैं दूर से दूर से हम देखे जाते हैं यह नियति है जीवन की एक दूसरे से मिलना, सारे बंधनों से अलग हो जाना, मानवीय भावनाओं को… Read More

poem kaya dosh hai mera

कविता : क्या दोष है मेरा

मेरे विचारों में शब्दों में कौन सा विष है जो हानि करता है दूसरों की मैं न्याय की बात करता हूं दलित की बात लिखता हूं अग्रसर हूँ लोक कल्याण की दिशा में समर्पित लम्बी यात्रा निरंतर श्रम हर दिन… Read More

poem-hum-sab-chalege

कविता : हम सब चलेंगे

मर्म नहीं, खुले में कर्म की बात करेंगे विश्व चेतना के साथ अपनी शक्ति को जोड़कर हम भी कुछ रचेंगे पीड़ा, दुःख, दर्द की असमानता के पोल खोलेंगे इन गाथाओं के मूल में स्वार्थ की क्रीड़ा को हम जग जाहिर… Read More

poem zindagi

कविता : जिंदगी

अलग नहीं हो तुम कभी मुझे से न मैं हूँ कभी अलग तुम से पारस्परिक सहयोग से चलती है जिंदगी अंतिम सांस तक अकेला कोई जी नहीं सकता सह अस्तित्व है प्रबल शक्ति। भेद – विभेद की रचना में अपने… Read More