अब तो संभल जा इन्सान सचेत कर रहा है भगवान देख ले धरती पे ये अजाब गुनाहों से तौबा कर इन्सान डर भी लगता है कोरोना से अपनी फितरत को तो पहचान मन में खोट फिर बुरा सोच क्यूं खुदा… Read More
अब तो संभल जा इन्सान सचेत कर रहा है भगवान देख ले धरती पे ये अजाब गुनाहों से तौबा कर इन्सान डर भी लगता है कोरोना से अपनी फितरत को तो पहचान मन में खोट फिर बुरा सोच क्यूं खुदा… Read More
अपने कमरे की दरारों को तस्वीरों से ढांककर मैंने बनाए तुम्हारे लिए महल चिकनी दीवारें और चमकते फर्श तुम्हारी कारों के लिए पथरीले रास्तों को बदल दिया समतल सड़कों में पार्क, माल, क्या नहीं बनाए तुम्हारे खुश रहने तुम्हे तुम… Read More
तलवार से नहीं किसी भी वार से नहीं. ख़ामोश इश्क़ मिटता है हथियार से नहीं. मैंने ये तो नहीं कहा तुम इश्क़ मत करो. गर तुम करो इश्क़ तो अधिकार से नहीं. देखूं मैं ख़्वाब में तुम्हें मतलब तो… Read More
बाज़ुओं के दम पर भूख की हर चुनौती को दरकिनार किये रहता था क़ुसूर बस इतना कि गाँव छोड़ दूर शहर में रहता था बे मौसमी प्रचंड कोरोनाई धूप में ज़रा सी छांव की चाह में मर गया चलते चलते… Read More
प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है यार सच्चा प्यार में तो कोई जात नहीं है यार यहीं तो प्यार, मोहब्बत का अंतिम कयामत है प्यार से पहले कोई दिल खात नहीं है यार। प्यार, मोहब्बत कर लेकिन सीमा से… Read More
पैनी नजर वाले व्यंग्यकार शरद जोशी विशुद्ध रूप से राजनीतिक लेख जितने भी अच्छे हों उनके पाठकों की संख्या बहुत ही कम होती है। राजनीति विश्लेषण की तुलना में व्यंग्य के पाठकों की संख्या ज्यादा हो सकती है क्योंकि उसके… Read More
सागर से भी गहरा है, हमारा रिश्ता। आसमान से भी ऊंचा है, हमारा रिश्ता। दुआ करता हूँ ईश्वर से की। ऐसा ही बना रहे हमारा रिश्ता।। देखे बिना जान लेता हूँ। बोले बिना ही तुम्हें, पहचान लेता हूँ। रूह का… Read More
न मैं चल ही सका, न मैं रो ही सका। जिंदगी को मानो, व्यर्थ ही गँवा दिया। तभी तो तन्हा रह गये, और तरस गये प्यार के लिए। पर प्यार करने वाला, कोई मिला ही नहीं। इसलिए तन्हा जिंदगी आज… Read More
मजदूर रिफॉर्म नहीं जानता उसे नहीं पता आत्मनिर्भरता का मतलब फॉर्मल/इन फॉर्मल सेक्टर उसे नहीं पता जीडीपी और ग्रोथ इकानॉमी और सेंसेक्स उसे कुछ नहीं पता बड़ी बड़ी बातों के बीच इस बड़ी त्रासदी के बीच उसे केवल यही पता… Read More
“वियोगी होगा पहिला कवि आह से उपजा होगा गान उमड़ कर ऑखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।” प्रकृति की महासभा का कुशल वक्ता– कवि जिस मनोदशा में लिख रहा होता है वह गुणात्मक शब्द-शैली के साथ-साथ मन के भीतर… Read More