anndata kisan

कविता : अन्नदाता किसान

अन्नदाता होकर भी ख़ुद पानी पीकर अपना भूख मिटाएँ पर जग को भूखा न सोने दे ऐसे अन्नदाता किसान हमारे… चाहे आँधी आये या तूफ़ान चिमिलाती धूप हो या कड़ाके की ठण्ड मेहनत करने से यह नहीं घबराते बच्चे समान… Read More

soch badlo

कविता : सोच बदलो

आगे निकलने की होड़ छोड़ मिलकर कदम बढ़ाओ बदलो न रास्ता मुश्किल में देख बन दुख में साथी दूसरों की हिम्मत बँधाओ घर, बाहर बहू -बेटी, महसूस सुरक्षित करें हो न शोषण मिले सम्मान ऐसा तुम संसार बसाओ। हो न… Read More

vishwas

कविता : करते जो खुद पर विश्वास

करते जो खुद पर विश्वास रचते वे ही नया इतिहास… बिना फल की इच्छा करे कर्मों पर हो अटल विश्वास धरती ही नहीं अंबर छू लेने का जिनके मन में बुलंद अहसास रचते वे ही नया इतिहास… छोड़ उम्मीद दूसरों… Read More

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कविता : प्रेम

माँ-बाप का प्रेम जग में सबसे अनमोल बच्चों की छोटी छोटी खुशियों में ढूँढें जो अपनी ख़ुशी उनकी खुशियों के लिए छोड़ दें जो अपनी सारी खुशियाँ। कभी बन जाते गुरु हमारे कभी बन जाएँ दोस्त अच्छे-बुरे का पाठ सिखाते… Read More

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शोध लेख : नारी संघर्ष की गाथा ‘नक्काशीदार केबिनेट’

प्रवासी साहित्यकारों में सुधा ओम ढींगरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। सुधा ओम ढींगरा का साहित्य दो संस्कृतियों पर आधारित होने के कारण उनके साहित्य की मूल संवेदना प्रवासी न होकर ‘अन्त: सांस्कृतिक’ पर आधारित हैं। भारतीय… Read More

bharat ki beti

कविता : भारत की बेटी

हम भारत की बेटी हैं समझो न किसी से कम पर्वत से ऊंची उड़ान हमारी… हम नहीं घबराती राहें चाहे कितनी भी हों मुश्किल पीछे मुड़कर हम नहीं देखती बस आगे ही बढ़ते जाती हम भारत की बेटी हैं। हम… Read More

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कविता : धन्यवाद, कोरोना!

कोरोना, तुमने हमें बहुत कुछ स्मरण करवा दिया पश्चिमीकरण की चकाचौंध में फंसकर, अपनी पुरातन संस्कृति भूल गए थे, हम तुमने ही हमारा परिचय पुन: संस्कृति से करवाया। देशी भोजन को छोड़ बर्गर, पिज्जा, लेग पीस के पीछे भागने वालों… Read More

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कविता : मेरी हिंदी

कोई मुझसे पूछे, क्या है हिंदी तो उसे बताऊं, मेरी शान है, हिंदी। मेरा अभिमान है, हिंदी मेरी पहचान है, हिंदी। मेरा ताज़ है, हिंदी माथे की बिंदी है, हिंदी। मेरी साँसों की ड़ोर है, हिंदी मेरी दिल की धड़कन… Read More

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शोध लेख : श्रमशक्ति के पुजारी श्री गुरु नानक देव

मेहनत वह अनमोल कुंजी है, जो भाग्य के बंद कपाट खोल देती है। यह राजा को रंक और दुर्बल मनुष्य को सबल बना देती है। यदि यह कहा जाए कि श्रम ही जीवन है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गीता… Read More

khud se khud ka sakshatkar

कविता : ख़ुद से ख़ुद का साक्षात्कार

अगर लिखती कविता मैं, तो लिखती ख़ुद पर स्वयं की प्रशस्ति में, ख़ुद को समर्पित । अगर गाती गीत मैं, गुनगुनाती स्वयं को स्वयं के आह्लाद को या स्वयं की पीड़ा को । अगर उड़ती मैं, तो उड़ती अपने आकाश… Read More