prem

कविता : प्रेम

माँ-बाप का प्रेम जग में सबसे अनमोल बच्चों की छोटी छोटी खुशियों में ढूँढें जो अपनी ख़ुशी उनकी खुशियों के लिए छोड़ दें जो अपनी सारी खुशियाँ। कभी बन जाते गुरु हमारे कभी बन जाएँ दोस्त अच्छे-बुरे का पाठ सिखाते… Read More

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शोध लेख : नारी संघर्ष की गाथा ‘नक्काशीदार केबिनेट’

प्रवासी साहित्यकारों में सुधा ओम ढींगरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। सुधा ओम ढींगरा का साहित्य दो संस्कृतियों पर आधारित होने के कारण उनके साहित्य की मूल संवेदना प्रवासी न होकर ‘अन्त: सांस्कृतिक’ पर आधारित हैं। भारतीय… Read More

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कविता : भारत की बेटी

हम भारत की बेटी हैं समझो न किसी से कम पर्वत से ऊंची उड़ान हमारी… हम नहीं घबराती राहें चाहे कितनी भी हों मुश्किल पीछे मुड़कर हम नहीं देखती बस आगे ही बढ़ते जाती हम भारत की बेटी हैं। हम… Read More

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कविता : धन्यवाद, कोरोना!

कोरोना, तुमने हमें बहुत कुछ स्मरण करवा दिया पश्चिमीकरण की चकाचौंध में फंसकर, अपनी पुरातन संस्कृति भूल गए थे, हम तुमने ही हमारा परिचय पुन: संस्कृति से करवाया। देशी भोजन को छोड़ बर्गर, पिज्जा, लेग पीस के पीछे भागने वालों… Read More

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कविता : मेरी हिंदी

कोई मुझसे पूछे, क्या है हिंदी तो उसे बताऊं, मेरी शान है, हिंदी। मेरा अभिमान है, हिंदी मेरी पहचान है, हिंदी। मेरा ताज़ है, हिंदी माथे की बिंदी है, हिंदी। मेरी साँसों की ड़ोर है, हिंदी मेरी दिल की धड़कन… Read More

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शोध लेख : श्रमशक्ति के पुजारी श्री गुरु नानक देव

मेहनत वह अनमोल कुंजी है, जो भाग्य के बंद कपाट खोल देती है। यह राजा को रंक और दुर्बल मनुष्य को सबल बना देती है। यदि यह कहा जाए कि श्रम ही जीवन है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गीता… Read More

khud se khud ka sakshatkar

कविता : ख़ुद से ख़ुद का साक्षात्कार

अगर लिखती कविता मैं, तो लिखती ख़ुद पर स्वयं की प्रशस्ति में, ख़ुद को समर्पित । अगर गाती गीत मैं, गुनगुनाती स्वयं को स्वयं के आह्लाद को या स्वयं की पीड़ा को । अगर उड़ती मैं, तो उड़ती अपने आकाश… Read More

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शोध लेख : नारी संघर्ष का प्रतिबिंब ‘सेवासदन’

सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत प्रेमचंद द्वारा रचित ‘सेवासदन’ उपन्यास की रचना आज से लगभग सौ साल पहले 1918 में की गई थी। उर्दू में इस उपन्यास का प्रकाशन 1919 में ‘बाज़ारे-हुस्न’ के नाम से हुआ था। प्रेमचंद अत्यंत संवेदनशील उपन्यासकार… Read More

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शोध लेख : समकालीन मनुष्य और उसकी सभ्यता का अंदरूनी बाघ

केदारनाथ सिंह हिंदी कविता की मुख्यधारा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक थे। ‘बाघ’ उनके द्वारा रचित एक लम्बी कविता-श्रृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े 21 खंड है। ‘बाघ’ कविता दो काल खंडों में लिखी गयी है, इसके पहले रचना-खंड में 16… Read More

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शोध लेख : हिंदी के संदर्भ में विज्ञापन की दुनिया

वर्तमान युग में विज्ञापन हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। आज हमारी नज़र जहाँ-जहाँ भी जाती है वहाँ हमें विज्ञापन ही विज्ञापन नज़र आते हैं। सवेरे-सवेरे आँख खुलते ही गर्म मा गर्म चाय की चुस्की के साथ जब… Read More