रात ढलने को है सपनो से निकलना है। दिन के उजाले में खुदको खोजना है। फिर अपनी राह पर हमें चलना है। और अपनी मंजिल को हमें पाना है।। लूटाकर सब कुछ हमने क्या पाया है। जीवन के लक्ष्य से… Read More
रात ढलने को है सपनो से निकलना है। दिन के उजाले में खुदको खोजना है। फिर अपनी राह पर हमें चलना है। और अपनी मंजिल को हमें पाना है।। लूटाकर सब कुछ हमने क्या पाया है। जीवन के लक्ष्य से… Read More
भारत युवाओं का देश है, और दुनिया की सबसे तेजी से उभरती शक्ति है लेकिन एक तरह से शक्ति का सबसे अधिक दुरुपयोग करने वाला देश भी। देश की आजादी के वक्त भी इतनी अराजकता नहीं रही होगी जितनी 21वीं… Read More
संस्कारों के, पालक महान तुम , संस्कृति तुमने ना छोड़ी । ली जो प्रतिज्ञा मेवाड़ इतिहास में, अब तक ना तुमने तोड़ी । बुरे समय में प्रण कर धारण, राणा के जो सहचर थे । पल-पल जिन ने साथ निभाया,… Read More
छन-छन के हुस्न उनका यूँ निकले नक़ाब से। जैसे निकल रही हो किरण माहताब से।। पानी में पाँव रखते ही ऐसा धुआँ उठा। दरिया में आग लग गई उनके शबाब से।। जल में ही जल के मछलियाँ तड़पें इधर-उधर। फिर… Read More
बापू तेरे सपनों का भारत , आज बड़ी मुश्किल में हैं । सत्य अंहिंसा तुझको पाने , ढूंढे हर महफ़िल में है । बापू तेरे सपनों का भारत , आज बड़ी मुश्किल में हैं । सच है बोझिल ,सच है… Read More
साहित्य और सिनेमा ऐसे माध्यम हैं, जिसमें समाज को बदलने की बहुत अधिक ताकत होती है। कहना गलत न होगा की सिनेमा, साहित्य से अधिक प्रभावशाली और आम जनता तक सरलता से पहुँचने में सक्षम है। साहित्य सिनेमा में रूपांतरित… Read More
पाँचवीं तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे। स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी। इस पापबोध के साथ कि विद्यामाता नाराज न हो जायें, कक्षा के तनाव में पेन्सिल का पिछला हिस्सा चबाकर… Read More
सनातन धर्म को दुनिया का सबसे पुराना धर्म कहा जाता है। वेदों और पुराणों के मुताबिक सनातन धर्म तब से है जब ये सृष्टि ईश्वर ने बनाई। जिसे बाद में साधु और संन्यासियों ने आगे बढ़ाया। ऐसे ही आठवीं सदी… Read More
प्रवासी साहित्यकारों में सुधा ओम ढींगरा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। सुधा ओम ढींगरा का साहित्य दो संस्कृतियों पर आधारित होने के कारण उनके साहित्य की मूल संवेदना प्रवासी न होकर ‘अन्त: सांस्कृतिक’ पर आधारित हैं। भारतीय… Read More
तेजी के साथ बदलते मूल्यों, नई पीढ़ी ओर पुरानी परम्परागत व्यवस्था का टकराव लाज़मी है, पर समाज अपने आप नहीं बदलता। बदलाव तभी होगा जब पीड़ाओं से गुजरने के बजाय उन समस्याओं का हल ढूंढे। तेजी के आगे बढ़ने वाला… Read More