कठिन होता है मजदूर होना मंडी में खड़े होना रोज़ पचास, सौ कम पर बिकना और दिन भर गुलाम बने रहना सोचा है कभी बिकना रोज़ रोज़ होता होगा कितना त्रासद ? पोटली में रोटी बिना छीली प्याज और चंद… Read More
कठिन होता है मजदूर होना मंडी में खड़े होना रोज़ पचास, सौ कम पर बिकना और दिन भर गुलाम बने रहना सोचा है कभी बिकना रोज़ रोज़ होता होगा कितना त्रासद ? पोटली में रोटी बिना छीली प्याज और चंद… Read More
क्षमा मिश्रा नाम था उसका। लेकिन मोहल्ले के सारे लड़के उसे छमिया कह कर पुकारते थे। महज़ अठारह बरस की उम्र में मोहल्ले में हुई अठाईस झगड़ों का कारण बन चुकी थी वो। उसका कोई भी आशिक़ चार महीने से… Read More
राहगीर हूं, चला जा रहा हूं। अकेला नहीं, है, यह एहसास दूर गहरे कहीं। पर भीड़ का हिस्सा बन, खो जाऊं। ये उनको,ईमान को, इससे इंकार भी है। बेसबब आवारा बन फिरता नहीं, जो गुज़रता हूं, उन गलियों से, तस्वीर,… Read More
लोग दे जाते हैं मुझको तो मुफ्त में बस यूं ही किसी और से पूंछो कि गम की कीमत क्या है दे देता है जान भी अपनी मोहब्बत के नाम पर कभी पतंगे से पूंछो कि उसकी कीमत क्या है… Read More
जिस प्रकार नदियों के तट पर पंडों के बिना आपको मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, गंगा मैया आपका आचमन और सूर्य देव आपका अर्ध्य स्वीकार नहीं कर सकते जब तक उसमें किसी पण्डे का दिशा निर्देश ना टैग हो,… Read More
मैं मोहब्बत करता हूँ नहीं, मोहब्बत हो जाती है लेकिन कोई निभाती नहीं,शरारत हो जाती है कभी श्याम दीवाना था, अभी अँचल दीवाना है दिलों के क़ैद में खून की तिजारत हो जाती है। अब तेरी यादों में मुझे नहीं … Read More
हमारा सोचना कि हम जोर लगा दें तो पत्थर को भी पानी बना सकते हैं हमारा सोचना कि हम उछाल दें पत्थर तबियत से तो सुराख कर सकते हैं आसमान में हमारा सोचना भर था। ऐसी बहुत सी चीजें जो… Read More
मछलियाँ नहीं जानती लेना प्रतिशोध वे नहीं पहचान पाती उस मछेरे को जिसने फँसाया उसे अपने जाल में वे तो जानती हैं बस तड़पना तड़प तड़प कर मरना नदी से विच्छिन्न हो दरअसल वे परिचित हैं भलीभाँति अपने इतिहास से… Read More
कर दिया था प्रवाहित जल में अग्निदेव के निर्देश पर अर्जुन ने पांडवों के महाप्रस्थान के समय अपना गांडीव और उसी के साथ अपना अक्षय तूणीर भी जो पाया था उन्होंने अपनी साधना से स्वयं शिव से सृष्टि के कल्याण… Read More
“श्रमिक एक्सप्रेस” खुल गई है शहर, तुम ख़ुश रहो वो चला गया, अपने गाँव वही, जिसे तुम मज़दूर कह कर दया से भर रहे थे। वही, जो न जाने कितने सालों से अपने पसीने को मेहनत की भट्टी में पकाकर… Read More