water is precious

गीत : पानी है अनमोल

पानी है अनमोल, समझो इसका मोल। जो अभी न समझोगे, तो सिर्फ पानी नाम सुनोगे।। आने वाले वर्षों में, पानी बनेगा एक समस्या । देख रहे हो जो भी तुम, अंश मात्र है विनाश का। जो दे रहा तुमको संकेत।… Read More

insaaniyat

कविता : कौन कहता है कि इंसान ज़िंदा है

कौन कहता है कि, इंसान ज़िंदा है मुखौटे में उसके तो, शैतान ज़िंदा है कहने की बात नहीं हक़ीक़त है ये, कि दिल के अंदर, शमशान ज़िंदा है यारो गुज़र गए वो ईमां के लम्हात, अब तो हर तरफ, बे-ईमान… Read More

zindagi

ग़ज़ल : ज़िंदगी

नकाब पर नकाब है, जनाब जिंदगी काटों भरा गुलाब है, जनाब जिंदगी दिन में दिखा देती है अँधेरा आजकल अजीब आफ़ताब है, जनाब जिंदगी अकसर मिला करती है बेवफाई बेशुमार कहने को लाजवाब है, जनाब जिंदगी दलान से दहलीज़ और… Read More

roti

कविता : रोटी

किसान का आटा प्यार का पानी। नमक है बीबी का यारों बहुत प्यार। इन सब के मिलने से रोटी का मिश्रण बन जाता। और चकले बेलन से खेलकर कहले तवा पर सिक जाती है। और पेट की भूख मिटाने के… Read More

beautiful

कविता : सुंदरता की…

नही होती सुंदरता किसी के भी शरीर में। ये बस भ्रम है अपने-अपने मन का। यदि होता शरीर सुंदर तो कृष्ण तो साँवले थे। पर फिर भी सभी की आँखों के तारे थे।। क्योंकि सुंदरता होती है उसके कर्म और… Read More

baagh kedarnath singh

शोध लेख : समकालीन मनुष्य और उसकी सभ्यता का अंदरूनी बाघ

केदारनाथ सिंह हिंदी कविता की मुख्यधारा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक थे। ‘बाघ’ उनके द्वारा रचित एक लम्बी कविता-श्रृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े 21 खंड है। ‘बाघ’ कविता दो काल खंडों में लिखी गयी है, इसके पहले रचना-खंड में 16… Read More

गीत : हे अधिनायक, सिद्धि विनायक

हे अधिनायक, सिद्धि विनायक कब लोगे अवतार हमारी आस तुम्हीं हो अटल विश्वास तुम्हीं हो स्वर्ग सरीखी इस धरती पर नर्क ने डाला डेरा पाप के हाथों पुण्य पराजित चारों ओर अँधेरा जग से अत्याचार मिटाओ करो पाप संहार हमारी… Read More

budhapa

कविता : बुढ़ापा

न जीता हूँ न मरता हूँ न ही कोई काम का हूँ। बोझ बन कर उनके घर में पड़ा रहता हूँ। हर आते जाते पर नजर थोड़ी रखता हूँ। पर कह नही सकता कुछ भी घरवालों को। और अपनी बेबसी… Read More

sadgi samajh baithe

ग़ज़ल : सादगी समझ बैठे

वो मुस्कराये क्या, कि हम आशिक़ी समझ बैठे हम तो मौत के सामान को, ज़िन्दगी समझ बैठे ये ख़ुदा का कुफ़्र था, या फिर नादानियाँ हमारी, कि धुप अंधेरों को यारो, हम चांदनी समझ बैठे न समझ पाए हम, उसके… Read More