happy mothers day

कविता : अम्मा ! तुझ बिन सब है झूठा

!! अम्मा !! अम्मा ! तुझ बिन सब है झूठा। मेरी ख़ातिर अम्मा मेरी, तूने कितने दुःख झेले थे। तेरी स्नेहमयी गोदी में, उझल-उझल के हम खेले थे। नियती ने सब खेल बिगड़ा, कालग्रास ने सपना लूटा। अम्मा तुझ बिन… Read More

Happy Mother's Day

हैप्पी मदर्स डे : ‘मां’ आपके बिना मैं कुछ नहीं

‘मां’ इस शब्द का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है । वैसे तो हर किसी पर रहता है, सही तथा गलत दोनों मायनों में । मां के कारण ही अनाथ बच्चों को भी बनते देखा है और मां के… Read More

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कविता : माँ नहीं है – मातृ दिवस विशेष

अस्पताल में पलंग पर लेटा था मैं मेरी हालत को देख लहू सुख गया था मां का रोने में भी असमर्थ बैठी थी आँसू भी सूख गये थे उसके शून्यता में डूबी एकटक देखती रह गयी थी नहीं निकल पाया… Read More

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मातृ दिवस : मां तो मां होती है

हमें इस संसार में लाने वाली एक महिला ही है, जिसके द्वारा हमारा जन्म इस पृथ्वी पर हुआ और उसे हम सब अपनी जननी, माँ, माता और आई आदि अनेक नमो से सम्बोधन करते है। उसके ही त्याग तपस्या के… Read More

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हैप्पी मदर्स डे : क्या लिखूँ माँ

सुबह मेरे मोबाइल में अलार्म के साथ कैलेंडर रिमाइंडर की भी घंटी बजी, जिस पे लिखा था आज मदर्स डे है| ईमानदारी से कहूँ, मुझे याद भी नहीं था कि आज कोई ऐसा दिन भी है, कभी सोचा ही नहीं,… Read More

कविता : नेपथ्य में

किसी स्थान को  पहचानने की तरकीब समय को निर्धारित करने का तरीका तकनीक के घोड़ों पर सवार सभ्यता और धरती पर मौजूद अक्षांश और देशांतर रेखाएँ नेपथ्य में हैं। हथेलियों पर बना मणिबंध  उस पर मौजूद  स्वस्तिक और द्वीप और… Read More

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महाराणा प्रताप जयंती : मेवाड़ के वीर योद्धा को शत शत नमन

महाराणा प्रताप बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जब मैं स्कूल में था ।प्रताप को विशेष रूप से जानने-बुझने की जिज्ञासा जागृत हुई । मैं स्तब्ध था,क्योंकि अभी तक राष्ट्रनायकों से ज्यादा आक्रमणकारियों के विषय में पढ़ने को मिला था ।… Read More

ग़ज़ल : तक़रार न होती !

खड़ी आँगन में अगर, दीवार न होती ! यूं दिलों के बीच यारा, तक़रार न होती ! महकती इधर भी रिश्तों की खुशबुएँ, गर जुबां की तासीर में, कटार न होती ! न आतीं यूं ज़िंदगी के सफर में आफ़तें, अगर रहबरों के दिल में, दरार न होती ! यहाँ खिलते गुल भी महकता जहाँ भी, गर नीयत बागवां की, शर्मसार न होती ! न अखरता इतना खिज़ाओं का मौसम, अगर दिल में ख़ारों की, भरमार न होती ! न होता पैदा खामोशियों का सिलसिला, अगर नफ़रतों से दुनिया, बेज़ार न होती ! यारो बन जाता आदमी भी देवता अगर, ये दुनिया ख्वाहिशों का, शिकार न होती ! न होती ज़रूरत इधर मुखौटों की “मिश्र”, अगर आदमी की आत्मा, बीमार न होती +80

महाराणा तेरे ऋणी हैं हम

जब से श्रृष्टि का निर्माण हुआ तब से सूर्य हर सुबह उदय होता है, शाम को अस्त हो जाता है और फिर अगली सुबह के साथ आसमान में चमक उठता है। सूर्य के निरंतर उदय और अस्त के साथ एक… Read More

कविता : मजदूर @लॉक डाउन

बड़े बेदर्द हैं ये ऊंची ऊंची बिल्डिंगों वाले चौड़ी सड़कों वाले शहर जिसने खून पसीने से बनाया, सजाया उसे ही न दे सके दो वक्त की रोटियां एक अदद छत और उनके हिस्से का मान उनकी आंखो के आंसू सूख… Read More