हम मां, पिता, भाई व बहन सहित अन्य रिश्तेदार नहीं चुन सकते हैं। दोस्त ही हैं जो हम अपने जिंदगी के सफर में चुनते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के मित्र कैसे हैं उससे भी उसकी शख़्सियत का अंदाजा मिलता… Read More
हम मां, पिता, भाई व बहन सहित अन्य रिश्तेदार नहीं चुन सकते हैं। दोस्त ही हैं जो हम अपने जिंदगी के सफर में चुनते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के मित्र कैसे हैं उससे भी उसकी शख़्सियत का अंदाजा मिलता… Read More
महंगाई बढ़ रही है, संबंध घट रहे हैं वो हम से कट रहे हैं, हम उन से कट रहे हैं इतिहास हो गए अब आँगन के खेल सारे क्वार्टर के दायरे में, अब घर सिमट रहे हैं महफिल सजी-सजी पर,… Read More
सच नहीं वो जिसे सुना जाए सच नहीं वो जिसे लिखा जाए आँख देखा भी झूठ होता है कैसे ज़िंदा यहाँ रहा जाए इस कदर तार-तार रिश्ते हैं किसे अपना सगा कहा जाए एक चेहरे पे कई चेहरे हैं कैसे… Read More
मां बाबा आज भी चौपाल पे ही पंचायत का फैसला सुनाने चले गये। मैं बोली भी थी बाबा आज कहीं न जाना मुझे मेला देखने जाना है खीज़ के ये सब एक ही सांस मे सरिता अपनी मां से बोली… Read More
मुझे चरणों में जगह दे दो न इंकार करो। मेरे मालिक हो मुझे प्यार करो प्यार करो।। ****** डोर जब तुम से बंधी है तो कहाँ जाऊं मैं। जख्मे दिल और कहीं जाके क्यों दिखाऊँ मैं।। मरहमे जख्म हो तुम… Read More
कजरी हमें भोजपुरी भाषा परम्परा से विरासत में मिली एक मधुर गीत है। यह गीत विशेष रूप से सावन महीने में गाया जाता है । सावन भी फाल्गुन की तरह उल्लास और उछाह का महीना होता है । जिस प्रकार… Read More
हम जब किसी धार्मिक समुदाय की बात करते हैं, तो इस बात को भूल जाते हैं कि वह समुदाय एक आयामी नहीं होता। उसमें वे सभी भेद- विभेद होते हैं जो दूसरे धार्मिक समुदायों में होते हैं। एक अभिजात मुसलमान… Read More
मैं खामोश हूँ लेकिन, मैं भी जुबाँ रखता हूँ ! लोगों के छोड़े तीर, दिल में जमा रखता हूँ ! न समझो कि न आता मुझे जीने का सलीका, मैं पैरों तले जमीन, मुट्ठी में आसमाँ रखता हूँ ! मैं… Read More
कितना मतलबी है जमाना, नज़र उठा कर तो देख कोंन कितना है तेरे क़रीब, नज़र उठा कर तो देख न कर यक़ीं सब पर, ये दुनिया बड़ी ख़राब है दोस्त, आग घर में लगाता है कोंन, नज़र उठा कर तो देख भला आदमी के गिरने में, कहाँ लगता है वक़्त अब, कोई कितना गिर चुका है, नज़र उठा कर तो देख क्यों ईमान बेच देते हैं लोग, बस कौड़ियों में अपना, कितना बचा है ज़मीर अब, नज़र उठा कर तो देख शौहरत की आड़ में, खेलते हैं कितना घिनोंना खेल, हैं कहाँ बची अब शराफ़तें, नज़र उठा कर तो देख जो हांकते हैं डींगें, औरों का भला करने की दोस्त, कितने सच्चे हैं वो दिल के, नज़र उठा कर तो देख तू समझता है सब को ही अपना, निरा मूर्ख है “मिश्र”, कितने कपटी हैं अब लोग, नज़र उठा कर तो देख +20