तुझपे ग़ज़ल लिखूं या कोई किताब लिख दूँ…दिल करता है तुझे महकता हुआ ग़ुलाब लिख दूँ…।तेरे हुस्न की जहाँ में कोई मिसाल नहीं है…तुझे आसमां पे चमकता हुआ माहताब लिख दूँ…।तेरी खूबसूरती वो दहकता हुआ शोला है….कभी कभी लगता है… Read More
तुझपे ग़ज़ल लिखूं या कोई किताब लिख दूँ…दिल करता है तुझे महकता हुआ ग़ुलाब लिख दूँ…।तेरे हुस्न की जहाँ में कोई मिसाल नहीं है…तुझे आसमां पे चमकता हुआ माहताब लिख दूँ…।तेरी खूबसूरती वो दहकता हुआ शोला है….कभी कभी लगता है… Read More
आ अब लौट चलें(https://www.youtube.com/watch?v=Rh4iH0ZR6CE) कोई गीत ‘आह् वान’ का स्वर लिए, किस प्रकार प्रभावी रूप से मारक क्षमता की उच्च तीव्रता को समेटे, सामूहिक उद् बोधन का ‘नाद’ बन कर, कालजयी नेतृत्व की बागडोर थामें, ‘युग प्रवर्तक’ बन जाता है, ‘आ… Read More
शरद सिंह हिन्दी-साहित्य में एक सशक्त स्त्री-विमर्शकार के रूप में उभर कर सामने आये हैं। इन्होंने साहित्य की प्रत्येक विधाओं में अपनी लेखनी चलाई हैं, जिसमें उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक संग्रह, काव्य संग्रह, जीवनी के साथ पत्रकारिता का रूप भी… Read More
बात तब की है जब मैं कक्षा सातवीं में अध्यनरत था। पिताजी को उपन्यास पढ़ने का शौक था और मुझे कॉमिक्स। कॉमिक्स की लत इतनी बुरी थी कि पाठ्यपुस्तकों के बीच में छुपा कर उन्हें पढ़ता था।मैंने कई बार कॉमिक्स … Read More
“ये जमीं तब भी निगल लेने को आमादा थीपाँव जब जलती हुई शाखों से उतारे हमनेइन मकानों को खबर है ना मकीनों को खबरउन दिनों की जो गुफाओं में गुजारे हमने “ये सुनाते हुए उस कश्मीरी विस्थापित के आँसूं निकल… Read More
मुझे साइकल चलाना सीखना था। पर दुर्भाग्य से मेरे घर में साइकल नही थी। मोहल्ले के सभी बच्चे साइकल चलाते रोज दिख जाया करते थे। उन्हें साइकल चलाते देख कर मुझे रोज उनसे ईर्ष्या और खुद पर शर्मिंदगी महसूस होती। एक… Read More
हिंदी साहित्य के तीन महान विभूतियों का आज (22 अगस्त) जन्मदिवस है। जिनमें से एक हिंदी साहित्य में व्यंग्य की पहचान और मेरे प्रिय लेखक ‘हरिशंकर परसाई’ जी हैं जिसने ‘भोलाराम का जीव’, ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ आदि व्यंग्य लिखा… Read More
“उनको बता दो की दुनिया कई हिस्सों में विभक्त है, उनके सिद्धान्तों की प्रयोगिकता हर जगह नही चल सकती… “”रात हर जगह गहरी होती है और जब कभी आसमान पर तारे छिटकते है तो सबका मन मचलता है प्रेमी की… Read More
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श के अंतर्गत समय–समय पर स्त्री जीवन की नई समस्याओं और नए मुद्दों पर तार्किक ढंग से चर्चा की जा रही है। साहित्य की अन्य विधाओं में जहाँ लेखक इन परिवर्तनों को आत्मसात कर प्रवक्ता के… Read More
गीत के बोल आज के समय में उन धनकुबेरों पर बिल्कुल सही बैठता है, जो अपनों को आज कौन, क्या, कब लेकर चला जायेगा कह नही सकते। कोई किसी के मन को ले गया तो वहाँ भी राजनीति थी, अब… Read More