गाँव के लगभग दस लोगों से पूछने और पूरे गाँव की तंग गलियों में भटकने के बाद आखिरकार वह खपरैल का मकान मिल ही गया. घर के ठीक सामने ही एक बूढी औरत अलाव जलाने के लिए पुआल में थोड़ी… Read More
गाँव के लगभग दस लोगों से पूछने और पूरे गाँव की तंग गलियों में भटकने के बाद आखिरकार वह खपरैल का मकान मिल ही गया. घर के ठीक सामने ही एक बूढी औरत अलाव जलाने के लिए पुआल में थोड़ी… Read More
तुझसे दूर भला कैसे जाऊं मैंदिल का हाल किसे सुनाऊं मैं तू हर्फ़ दर हर्फ़ याद है मुझेतुझे भला किस तरह भुलाऊँ मैं दिल में बस तेरी ही तस्वीर लगी हैकिसी और को इसमें कैसे बसाऊं मैं तुझे खोने का… Read More
खिड़की से एक टक बाहर देखती या बैचैनी से इधर-उधर चहलकदमी करती एक नई नवेली दुल्हन मानो आज उस पर तूफान आया हुआ है। आज उसे हर रिश्ता फीका लग रहा हो। इसी उधेड़बुन में थी कि अब क्या होगा।… Read More
मैं नारी हूँ और मैं शापित हूँ नरों की कुंठा झेलने के लिए और इस बेढंगे समाज में रोज़ नई प्रताड़नाओं से मिलने के लिए मैं कैसे तोड़ पाऊँगी इन सभी वर्जनाओं को जो इतिहास ने खड़े कर रखे हैं मेरे… Read More
आखर और मैथिली-भोजपुरी अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में भोजपुरी के गीतकार मोती बी.ए. की जन्मशताब्दी के अवसर पर ‘हिंदी सिनेमा के विकास में लोकसंगीत और लोकभाषा के प्रभाव (विशेष संदर्भ : भोजपुरी) विषयक आज हिंदी भवन में एक व्याख्यान का… Read More
इस दौर में जब देश में बाढ़ का प्रकोप है तो नाक से सांस लेने वाले प्राणियों में नाक एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है, पानी अगर नाक तक ना पहुंचा तो मनुष्य के जीवित रहने की संभावना कुछ दिनों… Read More
भारत माता तेरा स्वर्णिम इतिहास देता हमें गौरवानुभव का अहसास तेरी गोद से अनेक वीरों ने जन्म है लिया प्राणों का दे बलिदान नाम ऊँचा तेरा किया विद्वानों की तू पृष्ठभूमि कृषि से होता तेरा श्रृंगार जाती… Read More
कोई औरत जब किसी मर्द को सौंपती है अपना शरीर, वो सिर्फ शरीर नहीं होता, वो उसकी वासना भी नहीं होती, वो प्रकृति की आदिम भूख नहीं होती वो औरत बाजारु हो जरुरी भी नहीं औरत तलाशती है संरक्षण,… Read More
लेखकीय दृष्टि यदि अपने युगीन सामाजिक ,राजनीतिक ,धार्मिक,आर्थिक ,सांस्कृतिक दबावों ,घात –प्रतिघातों ,सम्बंधों में आती जटिलताओं के बीच मनुष्य की संपूर्णता में आत्मसात करते हुए जनाभिमुख और जनहित में अभिव्यक्त होती है तो वह सदैव प्रासांगिक बनी रहती है और… Read More
कला केवल यथार्थ की नक़ल का नाम नहीं है कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं उसकी खूबी यही है की यथार्थ मालूम हो……मुंशी प्रेमचंद बीसवीं शती के संवेदनशील रचनाकार उर्दू से हिंदी भाषा में लिखने वाले… Read More