guru ji

कविता : गुरु

दीपक समान जलकर रोशनी जग में फैलाए। सच और झूठ बीच अन्तर का बोध कराके सही, गलत का फ़र्क  हमें सिखलाते। कभी संभाला तो कभी डांट लगाई माता-पिता सी, जिन्होंने। नए ज्ञान से अवगत कराके हमें सपनों को सच करने… Read More

hariyali

कविता : सावन-सुरंगा

सरस-सपन-सावन सरसाया। तन-मन उमंग और आनंद छाया। ‘अवनि’ ने ओढ़ी हरियाली, ‘नभ’ रिमझिम वर्षा ले आया। पुरवाई की शीतल ठंडक, सूर्यताप की तेजी, मंदक। पवन सरसती सुर में गाती, सुर-सावन-मल्हार सुनाती। बागों में बहारों का मेला, पतझड़ बाद मौसम अलबेला।… Read More

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कविता : स्वतंत्रता दिवस

संग अपने हर्षोल्लास लेकर पुनः स्वतंत्रता दिवस आया है नमन उन वीरों को जिनके कारण हमने स्वतंत्र भारत पाया है जिनके शौर्य से परतंत्रता हारी स्वतंत्रता का हुआ था आगमन स्मरण करें उनके बलिदानों को देश के अमर जवानों को… Read More

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कविता : आधी आबादी करे पुकार

‘भरी सभा सी’ दुनिया देखे, ‘वस्त्रविहीन-अबलाओं’ को। जाति-समाज के नाम पे किसने, बांट दिया भावनाओं को? बहन-बेटी की लूटती इज्जत, सभ्य समाज पर कलंक सी। कुछ दानव से क्यों मनुज ऐंठते, बस, मानवता का अंत ही? सजा मौत भी, कमतर… Read More

sachai

लेख : पुजारिन

साहित्य को बचपन युवा और प्रौढ़ कि जीवन यात्रा के रूप में समाज राष्ट्र में भाष भाव के समन्वय और और सामाजिक परिपेक्ष्य में रिश्तों में उसके महत्व को समझने में कहानीकार डॉ पालरिया का कोई जोड़ नहीं है डस्टबिन… Read More

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लेख : रिश्तों का इंद्र धनुष

समाज में रिश्तों के बनते बिगड़ते आयाम और उसमे बिभिन्न मानवीय सम्बदनाओं को आज के स्पष्ट और भौतिकतवादी युग में उतार चढ़ाव कि मार्मिकता और कठोरता के सापेक्ष एक प्रयोगिग सत्य सन्देश यह कहानी देती है जहा व्यक्ति का स्वार्थ… Read More

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व्यंग्य : हिँडी

मोहेश कुमारे भारत सरकार को बरसों से दुहते आये हैं , पूरे देश के हर आलीशान हिंदी सम्मेलन में इनकी उपस्थिति उसी तरह अनिवार्य होती है जैसे नाई और पंडित के बिना सनातन विवाह सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो… Read More

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कविता : जिंदा रहनी चाहिए

मेरी आँखों में क्यों तुम आँसू बनकर आ जाते हो। और अपनी याद मुझे आँखों से करवाते हो। मेरे गमो को आँसुओं के द्वारा निकलवा देते हो। और खुशी की लहर का अहसास करवा देते हो।। मुझे गमो में रहने… Read More

dipak

कविता : स्वर संगम

तुम क्यों वेबजाह आ कर दिलके तारो को बजा देती हो। और फिर कही खो जाती हो क्या मिलता है ये करके। न सुकून से खुद रहते हो और न हमें रहने देते हो। मुदत हो गई तुम्हें भूले फिर… Read More

akhe

कविता: आँखें

आज की दुनिया में बहुत कम लोग अपनी आँखों से देख पाते हैं कई लोग, चेस्मा के बगैर बाहर कदम भी नहीं ले पाते हैं, कुछ लोग भविष्य को देखने में सक्षम होते हैं, दूसरे के अंतरंग में जाना, यथार्थ… Read More