sachai

साहित्य को बचपन युवा और प्रौढ़ कि जीवन यात्रा के रूप में समाज राष्ट्र में भाष भाव के समन्वय और और सामाजिक परिपेक्ष्य में
रिश्तों में उसके महत्व को समझने में कहानीकार डॉ पालरिया का कोई जोड़ नहीं है डस्टबिन में हिंदी साहित्य के नव पौध को।झोंको
से आहत और उबरते कश्ती में सजल और नयन है तो पवन रमाकांत गिरीश जैसे सामाजिक यथार्थ है तो पुजारिन साहित्य के मंदिर
कि वह बाला सुरभि है जिसके अंतरमन से साहित्य के सौंदर्य का युवा प्रतिबिम्ब और प्रतिनिधि है जो सौम्य साहित्य शास्त्र कि
विद्यार्थी और पोषक प्रेरणा है ।
शुरभि साहित्य कि रीड़ है तो शौम्य उस रीड कि अस्तित्व दोनों कि सम्पूर्णता का एकात्म भाव है हिंदी साहित्य कि पराकाष्ठा कि
राष्ट्रिय सामाजिक प्रमाणिकता जो शब्द से प्रारम्भ होकर संस्कृति संस्कार बन वर्तमान का मार्गदर्शन करते है तो युग और पीडी के लिये
प्रेरक प्रेरणा है–::मेरे पास शब्द हैं और है एक संवेदनशील ह्रदय।। जो दूसरों के लिए रोता भी है और धड़कता भी है उनके पास
गालियां है ।।वे ह्रदय हीन हैं और दूसरों के दुखों पर उन्हें रोना नहीं आता वे अट्टहास करते है।। पापी भी  है मैं अपने सब्दों उन्हें
बदलना चाहता हूँ ।।मानवता के लिये कलंक न बने क्योकि मानवता बचेगी तो मै और वे दोनों जीवित रहेंगे।।::
लक्ष्मी कान्त जी कहानी में हिंदी साहित्य के पितामह कि तरह उसे नई दिशा नई परम्परा नई सोच कि धरातल को सरथर्कता प्रदान
करते कहानी को जीवन्त बनाते है शौम्य द्वारा विद्यालय कि लाइब्रेरी से किताब लेना और वापस करने पर किताब के कुछ पन्नों के
गायब होने से विद्यालय के सूचना पट पर नाम आना होनहार सौम्य पर एक तरह से लांछन उसे आहत करता है ::मगर हमने पृष्ट
चुराए ही नहीं तो दंड क्यों:: लाइब्रेरी में बैठी सुरभि सौम्य और लिब्रेरियन कि नोक झोक सुन लेती है और नई किताब खरीद कर्
लाइब्रेरी में जमा कर देती है और कक्षा में सौम्य को सूचित करती है ।वास्तव में सौम्य कि कविताओं पर कक्षा में सारगर्भित समीक्षा
सुरभि द्वारा विद्यालयों में हिंदी कि प्रतिभा के उदभव और उसकी भविष्य कि संभावना का विश्वाश है । लाइब्रेरी कि घटना यदि इस
कहानी जीवन में नकारात्मकता का सामना है तो सुरभि सकारात्मकता कि ढाल धार ::कभी कभी सोचता हूँ यदि हम न मिलते कभी
बहुत कुछ रह जाता अनकहा भाव जिसका उदगम होता है तुमसे होता है तुम पर ही ख़तम होता है तुम्हारे बिन यह कलम अपूर्ण होती
शायद पैनी भी न होती यह दिशा हिन् भी हो जाती कुछ कुछ मेरी कलम कि स्याही में होता है मिश्रण तुम्हारी हंसी का घिर आई
उदासी का  उस पीड़ा और ख़ुशी का जो तुम्हे छू कर मुझ तक पहुचती है सीधे उतर जाती है मेरे ह्रदय में फिर बन जाती है एक कविता
या क़ोई कहानी ही तुमने पूर्णता दी है मुझे कभी मभी सोचता हूँ यदि हम न मिलते कभी ::सौम्य कि इस काव्य अभिव्यक्ति कि में
नायिका कि सहभागिता को स्वयम् स्वीकार करती है जिसे अपनी खूबसूरत समीक्षक नायिका सुरभि स्वयम् कि समीक्षा में स्वयं
स्वीकार करती है।

लक्ष्मी कान्त जी कि संस्था हिंदी के दीवाने में सुरभि और सौम्य दोनों ही संम्मिलित रहते है ।अध्ययन समाप्त होने के बाद सौम्य जो
इस कहानी में हिंदी का प्रतिनिधि करता है अध्यापक कि सरकारी नौकरी के लिये संघर्ष करता है जैसा कि सर्व व्यापी है कि भारत में
हिंदी विषय  कि शिक्षा ग्रहण करने वालों के लिये नौकरी कि ना के बराबर संभावना  रहती है  उसी सच्चाई का सामना करते करते
सौम्य थक कर मजबूरी में प्राइवेट स्कूल में नौकरी करने लगता है।सुरभि के माँ बाप उसके विवाह के लिए सुयोग्य वर कि तलाश करते
है मगर बहुत मुश्किल होती है कारण सुरभि शाकाहारी प्याज लहसुन भी नहीं खाती जबकि उसके समाज में शाकाहार का प्रचलन
नहीं है अतः सुरभि के पिता सुरभि का विजातीय विवाह सौम्य से कर् देते है।कहानी में सौम्य और सुरभि दोनों संस्कारिक मूल्यों के
प्रमुख पात्र है जो सात्विक जीवन और समरस सार्थक समाज राष्ट्र का प्रतिनिधित्व बखूबी करते है ।सौम्य के परिवार के सदस्य सौम्य
और सुरभि के सादगी और सरलता का मजाक उड़ाते।सौम्य का भाई संकल्प अपनी वाक् पटुता से बीमा कंपनी के एजेंट के रूप कार्य
करते हुये बहुत पैसा कमाता है सौम्य और संकल्प दोनों  ही एक माता पिता कि संतान होने के वावजूद दोनों के बिचारों में असमानता
है संकल्प कि पत्नी श्रुति अपने पति के धन कमाने कि सहभागी बन गयी सौम्या कि पत्नी कलम के धनी पति के लेखनी प्रबृत्ति कि
सहचरी दोनों भाई एक एक पुत्र पुत्रियों के पिता बन जाते है।
सौम्य के माता पिता सौभ्य और सुरभि कि सादगी और आचरण युक्त जीवन से सदैव प्रसन्न रहते और अपने दमन का सारा आशिर्बाद
देकर दुनियां छोड़ गए अब सौम्य और सुरभि ने पाइवेट स्कूल कि नौकरी छोड़ अपना स्वयं का स्कूल खोल लिया था लक्षी कान्त जी
कि संस्था  हिंदी के दीवाने का पुरे देश में विस्तार सौम्य और सुरभि ने अपने अथक प्रयास से किया जो लक्ष्मी कान्त जी कि हिंदी के
प्रति सेवा और निष्ठा को सौम्य और सुरभि कि श्रद्धांजलि थी सौम्य के बच्चे अपने माँ बाप के कार्यों में हाथ बटाने लगे पचपन वर्ष की
उम् कि दहलीज़ पर पहुँचचुके थे सौम्य और सुरभि लकिन आर्थिक तौर पर उनके स्तिति में क़ोई परिवर्तन नहीं हुआ आर्थिक तंगी सदैव
बानी रहती सौम्य का भाई संकल्प आर्थिक दृष्टीकोण से सबल और संपन्न हो चूका था मगर उसने ना तो कभी अपने भाई को हिंदी
साहित्यिक गतिविधियों के लिये सराहा ना ही कभी कई आर्थिक सहयोग किया कहानीकार ने बड़ी चतुराई से हिंदी और उसके सेवकों
कि स्तिति का सत्य और सार्थक बर्णन सौम्य और संकल्प के माध्यम से किया है संकल्प बीमा कंपनी का एजेंट आर्थिक तौर पर सपन्न
और समाज का मजबूत अवयव है जो पूरी जिन्दगी अपने भाई के हिंदी साहित्य के प्रेम सेवा को तिरस्कृत करता है ।आज यही सच्चाई
हिंदी के सेवक और हिंदी के प्रति समर्पण कि वास्तविकता है हिंदी सेवकों के पास ना तो नौकरी है ना पैसा सम्मान है वे सिर्फ सेवक
कि तरह सेवा करते रहते है जिसका प्रत्यक्ष कटाक्ष करते इस कहानी में प्रतिनिधित्व करते है सौम्य और सुरभि

सुरभि पुजारिन एन जी ओ के द्वारा साहित्य सेवा में बहुत से मुकाम हासिल करती  है उसके समाचार साक्षात्कार टीवी रेडियो और
देश के सभी माध्यमों में छाए रहते है सौम्य बहुत से सम्मान अर्जित करता है उधर संकल्प का बेटा आई आई टी से इंजीनियरिंग कर
अमेरिका बस जाता है हिंदी साहित्य हिंदुस्तान कि मर्यादा और गैरव के साथ हिन्दुस्थान में  रह उसकी गरिमा को चार चाँद लगता है
जिसका प्रतिनिधित्व इस कहानी में सौम्य सुरभि कि संताने उदय और प्रगति करती है।कहानी में संकल्प जो पश्चात कि भौतिक वादी
शैली का प्रतिनिधित्व करता आर्थिक सम्पन्नता कि चकाचौध को उपलब्धि मानता है का बेटा भी पिता के लक्ष्यों के पीछे भगाता
भगाता अमरीका में बस जाता है उसे आने कि फुरसत नहीं अब संकल्प अकेला अपने दौलत कि दीवारों के बीच रह जाता है जो उसे
डरावनी और कटाने को दौड़ती है अन्तह उसे अपनी भूल का एहसास होता है और वह भी अपनी जिंदगी कि सम्पूर्णता के साथ हिंदी
हिंदुस्तान को समर्पित हो जाता है।

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