गीत : तुझसे दूर भला कैसे जाऊं मैं

तुझसे दूर भला कैसे जाऊं मैंदिल का हाल किसे सुनाऊं मैं तू हर्फ़ दर हर्फ़ याद है मुझेतुझे भला किस तरह भुलाऊँ मैं दिल में बस तेरी ही तस्वीर लगी हैकिसी और को इसमें कैसे बसाऊं मैं तुझे खोने का… Read More

लघु कहानी : दहेज़ का असर

खिड़की से एक टक बाहर देखती या बैचैनी से इधर-उधर चहलकदमी करती एक नई नवेली दुल्हन मानो आज उस पर तूफान आया हुआ है। आज उसे हर रिश्ता फीका लग रहा हो। इसी उधेड़बुन में थी कि अब क्या होगा।… Read More

कविता : मैं नारी हूँ

मैं नारी हूँ और  मैं शापित हूँ नरों की कुंठा  झेलने के लिए और इस बेढंगे समाज में रोज़ नई प्रताड़नाओं से मिलने के लिए मैं कैसे तोड़ पाऊँगी इन सभी वर्जनाओं को जो इतिहास ने खड़े कर रखे हैं मेरे… Read More

भोजपुरी के गीतकार मोती बी.ए. की जन्मशताब्दी पर विशेष

आखर और मैथिली-भोजपुरी अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में भोजपुरी के गीतकार मोती बी.ए. की जन्मशताब्दी के अवसर पर ‘हिंदी सिनेमा के विकास में लोकसंगीत और लोकभाषा के प्रभाव (विशेष संदर्भ : भोजपुरी) विषयक आज हिंदी भवन में एक व्याख्यान का… Read More

व्यंग्य : ऊंची नाक का सवाल

इस दौर में जब देश में बाढ़ का प्रकोप है तो नाक से सांस लेने वाले प्राणियों में नाक एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है, पानी अगर नाक तक ना पहुंचा तो मनुष्य के जीवित रहने की संभावना कुछ दिनों… Read More

कविता : भारत माता

भारत माता तेरा स्वर्णिम इतिहास देता हमें गौरवानुभव का अहसास         तेरी गोद से अनेक वीरों ने जन्म है लिया         प्राणों का दे बलिदान नाम ऊँचा तेरा किया विद्वानों की तू पृष्ठभूमि कृषि से होता तेरा श्रृंगार        जाती… Read More

कविता : कोई औरत जब…

कोई औरत जब  किसी मर्द को  सौंपती है अपना शरीर, वो सिर्फ शरीर नहीं होता, वो उसकी वासना भी नहीं होती, वो प्रकृति की आदिम भूख नहीं होती वो औरत बाजारु हो जरुरी भी नहीं           औरत तलाशती है संरक्षण,… Read More

“कलम का सिपाही” (प्रेमचंद) : लेखकीय दृष्टि

लेखकीय दृष्टि यदि अपने युगीन सामाजिक ,राजनीतिक ,धार्मिक,आर्थिक ,सांस्कृतिक दबावों ,घात –प्रतिघातों ,सम्बंधों में आती जटिलताओं के बीच मनुष्य की संपूर्णता में आत्मसात करते हुए जनाभिमुख और जनहित में अभिव्यक्त होती है तो वह सदैव प्रासांगिक बनी रहती है और… Read More

प्रेमचंद : कहानियों का सबसे बड़ा खिलाड़ी

कला केवल यथार्थ की नक़ल का नाम नहीं है कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं उसकी खूबी यही है की यथार्थ मालूम हो……मुंशी प्रेमचंद             बीसवीं शती के संवेदनशील रचनाकार उर्दू से हिंदी भाषा में लिखने वाले… Read More

munshi premchand

वर्तमान समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता

प्रेमचंद को पढ़ना उन चुनौतियों को प्रत्यक्ष अनुभूत करना है, जिन्हें भारतीय समाज बीते काफी समय से झेलता आया है और आज भी उन चूनौतियों का हल नहीं ढूँढ पाया है। दलित, स्त्री, मजदूर, किसान, ऋणग्रस्तता, रिश्वतखोरी, विधवाएँ, बेमेल विवाह,… Read More