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कविता : पूस की बरसात

देखे थे मैंने सावन-भादों झूमते हर बार, पहली बार पूस की रातों को बरसते देखा था। भादों की चाँदनी में पेड़ तो जगमगाए थे पूस की रातों में जुगनुगों को झुरमुट से झाँकते पहली बार देखा था। पूस की उन… Read More

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कविता : गंवारा न था

ये मेरे भीतर छिपी व्याकुलता ही है, जिसने मेरे स्वभाव में अधीरता को जन्म दिया है। माना मेरी बुद्धि संकीर्ण थी और बुद्धजीवियों के व्यापक परंतु, इस संकीर्ण ने ही ढांढस बंधा स्वयं को संभाला, विपरीत व्यथाओं मेँ हर-पल। प्रतिकार,… Read More

कविता : समझ नहीं आता हम भारत को कैसे स्वच्छ करें!

समझ नहीं आता हम भारत को कैसे स्वच्छ करें? क्या वही थी वो गंगा, अविरल सी बहती, जहाँ वायु में शुद्धता का समावेश था। कितना सुंदर था हमारा भारत कितना स्वच्छ था हमारा भारत पूरे विश्व में शुद्धता का  परिमाण… Read More

कविता : सोच बेटी सोच

सोच बेटी सोच…! क्यूँ है इस दुनिया में आयी तू क्यूँ लड़नी पड़ेगी इतनी लड़ायी? सोच बेटी सोच … इस बात में है बहुत गहरायी। क्यूँ इनके अस्तित्व, इनके वजूद पर, हर समय मुसीबतें आयी? क्यूँ इनके आगे बढ़ने पर,… Read More

कविता : उड़ने के लिए

ला दो मुझे भी वो पंख उड़ने के लिए, पंख पसारकर हर ऊँचाई। पंखों के बिन उड़ना कैसा? उम्मीद के बिन ठहरना कैसा? उम्मीद की कली है खिलने दो न मुझमें, पंख पसारकर उड़ने दो न मुझे! आएगा एक दिन… Read More

कविता : चलती हूँ कुछ दूर

चलती हूँ कुछ दूर, पाँव रुक जाते है। मंजिल पर पहुँचने से पहले, हालात बिगड़ जाते है। बहुतों को देखा है, लिखते अपनी कहानी। हम जब लिखते है, हमारे हाथ रुक जाते है। बैठें थे जब लिखनें वो ऊपरवाले, क़िस्मत… Read More

कविता : टिक-टिक-टिक

घड़ी की सुई,                            टिक-टिक-टिक। हृदय की गति, धक-धक। वक़्त की चाल, है रफ़्तार। पानी की बूंदें, टप-टप-टप। साँसों का चलना, अंदर-बाहर, ऊपर-नीचे। कुछ कारवां आगे, कुछ लम्हें पीछे। पलकें झपके, ऊपर-नीचे। सब चंचल गतिमान, वजनी द्रव्यमान। हर जगह शोर, स्पष्ट… Read More

कविता : दो वक़्त की रोटी

ये “दो वक़्त की रोटी” है बड़े काम की भैया, रख लो इसे संभाल के भैया। जिसको मिल जाए उसकी तो बल्ले-बल्ले, ना मिले तो बुरा हाल है भैया। सोचो गर दुनिया मेँ खाना जरूरी न होता, तो शायद किसी… Read More

कविता : अंतर्द्वंद-अन्तर्मन

अन्तर्मन अंतर्द्वंद, अंतर्द्वंद क्षितिज-मन। सूर्य-किरण ठिठुर , हलचल-मन कठोर। क्षण-क्षण आशा, की दृश्य-विभोर। व्याकुल-दृष्टि, नेत्र-रिक्त। ग्रीष्म-शीत-वर्षा, ग्रीष्म-शीत-वर्षा, वर्षा-वर्षा-वर्षा। हर क्षण समझा, त्रुटि वही फिर दोहरा। क्षमा-याचना….. क्षमा, ना श्रुति ना शब्द। ग्रीष्म-शीत-वर्षा ये नहीं मौसमी वर्षा, अब कुछ नहीं कहना।… Read More

कविता : चलो उस ओर

चलो उस ओर, जहां सूरज निकलता है। पंख फैलाएँ, बिना रुके, बिना ठहरे। चलो उस ओर, जहां ऊर्जा-प्रकाश मिलता है। उम्मीद की किरणों से, हमारा मन प्रभावित  होगा। ऊर्जा रूपी प्रकाश से, हमारा चेतन प्रकाशित होगा। प्रतिपल बढ़ता हमारा कदम,… Read More