bhaosaa

कविता : क्या कह कर गये थे

आज और कल में क्या है अंतर और आने वाले कल में क्या होगा। क्या इंसान इंसान को समझेगा और अपनी इंसानियत जिंदा रखेगा। और क्या एक दूसरे को ही वो अपना शिखार बनायेगा। इसकी भविष्य वाणी क्या कोई आज… Read More

noratri

कविता : माँ तेरे रूप अनेक

मन मंदिर में आन विराजो मेंहर वाली मातारानी। दर्शन की अभिलाषा लेकर आ गये हम मेंहर में। तुमको अपने दर्शन देने बुला लो हमें मंदिर में। हम तो तेरे बच्चे है काहे घूमा रही हो दुनिया में।। कितने वर्षो से… Read More

looking sky

कविता : क्या है ये दुनियाँ

ये दुनियाँ बहुत सुंदर है मुझे रहना नहीं आया। ये जिंदगी बहुत खूबसूरत है मुझे इसे जीना नहीं आया। दिया क्या कुछ प्रकृति ने इसे भोगने के लिए। मगर मेरी मन में तो कुछ और चल रहा था। इसलिए छोड़कर… Read More

himtaj mata

भजन : जय हिंगलाज मां

जय-जय तेरी मां हिंगलाज, दर्शन करने आए आज । तेरा आशीर्वाद जो पाएं , भवसागर से हम तर जाएं । दुनिया में ज्ञान के दीप जलाएं, तेरी अमरज्योत उजलाएं । उड़ते रहें पंख परवाज । जय-जय तेरी मां हिंगलाज ,… Read More

कविता : क्या क्या नहीं दिया तूने

अगर दर्द न होता तो खुशी की कीमत न होती। अगर चाहने से मिल जाता सब कुछ दुनियाँ में तो..। ऊपर वाले की किसी को जरूरत न होती। और खुद ही बन जाता अपना भाग्य विधाता।। भूला दो बीता हुआ… Read More

basant

कविता : बसन्त ने छेड़ी तान

मन्द मन्द बसंत ने छेड़ी तान भक्ति भी खड़ी लिए फूलो का हार।। सरयू तट है उदार बहती है शीतल धार नव सुगन्ध भरती कल – कल धारा बहती।। सरयू तट पर राम झाकी धनुष बाण लिए हाथ पीताम्बर तन… Read More

jhuti

कविता : झूठ

हर जगह कई लोग चुपके – चुपके चलते हैं अपना मुँह छिपाते वो धीरे – धीरे चलते हैं वर्ण-जाति-वर्ग की निशा में एक दूसरे को कुचलाते भेद – विभेद, अहं की आड़ में असमर्थ बन बैठे हैं मनुष्य एक दूसरे… Read More

pahli bar

कविता : पूस की बरसात

देखे थे मैंने सावन-भादों झूमते हर बार, पहली बार पूस की रातों को बरसते देखा था। भादों की चाँदनी में पेड़ तो जगमगाए थे पूस की रातों में जुगनुगों को झुरमुट से झाँकते पहली बार देखा था। पूस की उन… Read More

ramji

कविता : मर्यादा की मूरत राम

माँ कौशल्या की कोख से नृप दशरथ सुत जन्में राम। नवमी तिथि चैत्र मास को अयोध्या का था रनिवास।। निहाल हुए अयोध्यावासी, बजने लगी चहुंओर बधाई। जन जन के अहोभाग्य हो, मानुज तन ले प्रगटे रघुराई।। माता पिता की करते… Read More

nirwan

कविता : निर्वाण की ओर

जन्मी उर में जिज्ञासाएँ, देखा जब निस्सार जगत; पीड़ा मानव मन की देखी, शूल हृदय में था चुभा। “उर्वरा थी भूमि मन की, बीज जा उसमें गिरा।।” उठी हूक अंतःस्थल में, ये कहां हम आ गए? छोड़ सारे वैभवों को,… Read More