Kakori kand

कविता : काकोरी कांड

नौ अगस्त उन्नीस सौ पच्चीस, काकोरी रेलवे स्टेशन, जैसे ही चली सहारनपुर पैसेंजर, हुई चेनपुलिंग, रुकते ही ट्रेन गार्ड को क्रांतिकारियों ने लिया कब्जे में, लूटना था सरकारी खजाना, हड़बड़ी में निरुद्देश्य चल गयी माउज़र, मरा एक रेल पैसेंजर, लोग… Read More

ishq

कविता : इश्क़ की परिभाषा

तुझसे मेरा दूर रहना, तेरे बगैर हमारा जीना, तुझसे कभी ना रूठना, तेरी यादों को समेटे रखना, यही इश्क़ की परिभाषा है। तेरे लिए आहें भरना, तुझे हर पल याद करना, तुझसे शिकायत ना करना, तेरी नफ़रत कुबूल करना, यही… Read More

hamein khona nahin aata

ग़ज़ल : हमें खोना नहीं आता 

हम कैसे बताएं यारो कि, हमें रोना नहीं आता यूं खामखा पलकों को, हमें भिगोना नहीं आता सहते रहें हैं यारों के सितम हम तो बस यूं ही, अकारण बीज नफ़रत के, हमें बोना नहीं आता अच्छा है कि कर… Read More

to baat bane

ग़ज़ल : तो बात बने

न वक़्त को बेकार गंवाओ, तो बात बने न किसी की आत्मा दुखाओ,तो बात बने बाद मरने के पहुँच जाते हैं सारे के सारे, किसी ज़िंदा को समझ पाओ, तो बात बने जितनी गिराने पे दिखाते हो एकता यारो, किसी… Read More

aap mahkoge

कविता : आप महकोगे

फूलों की सुगंध से, सुगन्धित हो जीवन तुम्हारा। तारों की तरह चमके, जीवन तुम्हारा। उम्र हो सूरज जैसी, जिसे याद रखे दुनियाँ सारा। आप महफ़िल सजाएं ऐसी, की हम सब आये दुबारा।। आपके जीवन में हजारों बार, मौके आये इस… Read More

man alone and thinking

सही और ग़लत के बीच

सही और ग़लत के बीच भी बहुत कुछ ऐसा होता जिससे परिस्थितियों का निर्माण होता है । सही कोई क्यो है ? जितना महत्वपूर्ण यह प्रश्न है उतना ही महत्वपूर्ण इसका जवाब भी तलाशना होता है कि कोई गलत क्यों… Read More

happy world tribal day

आदिवासी दिवस विशेष

लगे हैं वनों की रक्षा में जो जमीन उनकी छीनी जा रही है। वनवासी वो जगसेवक हैं वो नींद उनकी छीनी जा रही है।। वो भी तो लगे हैं नित पर्यावरण की सुरक्षा संरक्षा में ही, प्राणवायु को को बचाने… Read More

ghazal betha me soch rha tha

ग़ज़ल : बैठा मैं सोच रहा था

अगर जिंदगी ना होती तो ये फ़साने ना होते, ना दर्द होते ना दुःख कभी नसीब में होते!! रोजाना ऑफिस जाने के झंझट से दूर रहता, ना हर सुबह जल्दी उठने को फिक्रमंद होते!! ना महीने की सैलरी पाने पर… Read More

poem khet khalihan

कविता : खेत और खलिहान सजाया

जिसने अथक परिश्रम करके खेत और खलिहान सजाया जिसने खून-पसीना देकर मिट्टी में सोना उपजाया खुद भूखे रहकर भी जिसने दुनिया को भर पेट खिलाया आज अन्नदाता आखिर क्यों खेत छोड़कर सड़क पे आया सैंतालिस से वर्तमान तक आईं-गईं, कई… Read More

कविता : अपना ही राग अलापो

लिखे वो लेखक पढ़े वो पाठक। जो पढ़े मंच से वो होता है कवि। जो सुनता वो श्रोता होता है। यही व्यवस्था है हमारे भारत की। लिखने वाला कुछ भी लिख देता है। पढ़ने वाला कुछ भी पढ़ लेता है।… Read More