ab madari ho gaye

ग़ज़ल : जमूरे,अब मदारी हो गए

खुद पर ही खुद के फैसले,अब भारी हो गए कल तलक था सब कुछ,अब भिखारी हो गए बदल गया है दुनिया का चलन कितना यारों, कभी थे जो शिकार खुद अब शिकारी हो गए क्या याद करना अब उन गुज़रे… Read More

samajh

कविता : समझ नहीं पाया

कभी गमों के साये में जिये तो कभी खुशी के महौल में। जिंदगी को जीने के कई नये-नये तरीके मिले। बदलते मौसम के साथ हम भी जीने लगे। और इरादे भी समयानुसार हम भी बदलने लगे।। भले ही ये सब… Read More

kaha gaya

कविता : मोरों का नर्तन कहाँ गया

वो मोरों का नर्तन कहाँ गया ! फूलों का उपवन कहाँ गया ! अरे कहाँ गए सब मेरे अपने , हम सबका आँगन कहाँ गया ! सबका ही सुख है अपना सुख, वो जीवन का दर्शन कहाँ गया ! रिश्तों… Read More

diwali

कविता : दीवाली पर मिलेगी

दीप जलाओ तुम सब। करो अंधकार को दूर। रोशनी कर लो मन में। इस दीपाली पर।। घर का कचड़ा साफ करो। मन को करो तुम शुध्द। जग मग कर दो गली मौहल्ले और अपना घर। दिलो में खुशीयाँ भर दो,… Read More

prakashparv

कविता : प्रकाश पर्व

करो प्रकाशित घर आँगन दुनिया से तम दूर भगाओ पहले सब को खुशियां बांटो फिर अपने घर दीप जलाओ अपने मन को निर्मल कर लो यारा लोभ मोह सब दूर करो बस करो मदद एक दूजे की दिल से दिल… Read More

sahsa maun mukhar hua

कविता : सहसा ! मौन हुआ मुखर

एक दिन देखा मैंने, सहसा ! एक काले से साए को बाहर आते, आज के आदमी सा, कुछ सहमा, कुछ सकुचाया, उस साए ने, बाहर आ प्रश्न किया…… क्या तुम अब तक ज़िन्दा हो ? …कैसे ? मुझे लगा मैं… Read More

chalne wale log

ग़ज़ल : हर कदम पे छलने वाले लोग

यहाँ सब के सब मतवाले लोग। हर कदम पे छलने वाले लोग। है बड़ा सुघड़ सा चेहरा उनका, पर दिल के हैं सब काले लोग। वो करते हैं बातें चिकनी चुपड़ी, पर दिल में खुन्नस पाले लोग। अब नहीं मोहब्बत… Read More

jindgi aur prakritia

कविता : ज़िंदगी और प्रकृति

रात की तन्हाई में, ख़ामोश नम निग़ाहों से ! ओस की बूंद बन, फूलों पर ढुलक पड़ी मैं !! दिन के अंधियारे में, महफ़िल की तन्हाईओं से ! रोशनी की किरण बन, रोशनदान में बिखर गयी मैं !! मंज़िल की… Read More

khuda

ग़ज़ल : ख़ुदा का दर्जा क्या खाक होता

मोहब्बत के बिना रहना,क्या खाक होता यूं ज़िंदगी में जोश भरना,क्या खाक होता गर न होते दुनिया में,सुख दुःख के पचड़े, तो फिर अश्कों का झरना,क्या खाक होता गर न होती किसी के जिगर में,ये बेचैनियां, तो ज़िंदगी जीने का… Read More

jivansangini

कविता : संगिनी का साथ

मैं अब कैसे बतलाऊँ, अपने बारे में लोगों। कैसे करूँ गुण गान, अपने कामों का मैं। बहुत कुछ सीखने को, मिला मुझे यहाँ पर। तभी तो निकाल दिये, जीवन के 28 वर्ष।। मिला सब जीवन में जो भी चाहा था… Read More