sahsa maun mukhar hua

एक दिन देखा मैंने, सहसा !
एक काले से साए को बाहर आते,
आज के आदमी सा,
कुछ सहमा,
कुछ सकुचाया,
उस साए ने,
बाहर आ प्रश्न किया……
क्या तुम अब तक ज़िन्दा हो ?
…कैसे ?
मुझे लगा मैं आत्मा हूँ तुम्हारी,
अंतस के कोने में,
घुटनों बीच सिर दबाए,
घुट रही थी मैं….
फ़िक्र में, मैं तुम्हारी |
पर तुम ज़िन्दा हो….
हा हा हा ….
दीर्घ निःश्वास छोड़,
वह सोच में था, अब गहरे |
मुड़ गया …..दूर हो कहीं खो गया ||
सहसा ! आदमी ने महसूस किया |
कहीं कुछ कमी सी रह गयी है |
लगा हृदय की स्पंदनों में अब….
ताल, लय, छंद, स्वर, रस नहीं |
मशीनी कलपुर्जों सा,
धड़ – धड़ – धड़ ….
धड़धड़ाता चल रहा है भीतर |
जिह्वा का रस !
कसैला सा हो गया यकायक ….
अधरों की स्मित हंसी ठिठक सी गयी |
चमचमाती रोशनाई से,
एकाएक आँखें चौंधियाने सी लगीं हैं |
बदहवास हुआ आदमी,
कानों को अपने भींच |
आँखों को अपने मिच,
चीख़ उठा आदमी |
रुक जाओ… रुक जाओ,
लौट आओ, फिर एक बार |
उखड़ जाऊंगा,
मैं तुम बिन |
हुआ अभी मान मुझे |
तुम आत्मा हो मेरी ही,
सुन सहसा रुका वह साया |
सदा की भांति अपने अंक में,
पुनः आदमी का आदमी से |
संलाप – मिलाप हुआ ||
जैसा भी था वह,
चूँकि अपना ही साया था |
कुछ गैरों सा,
कुछ कुछ रीता सा |
पर बहुत कुछ अपनों सा,
वह जड़ था,
फ़लित वृक्ष का |
क्योंकि वह जड़ता थी,
और यह चेतना है ||
मरती, मिटती कभी भी नहीं |
अनुकूल होती परिस्थिति के साथ,
दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ती |
फूलों की खुशबू सी महकती ||
किसलय सी मुकूलित होती |
मेंहदी के रंग सी चढ़ती ||
यह कोई ग़ैर नहीं
अपनी माँ, बेटी, बहू, मौसी और खाला |
अपना मान – सम्मान और
अपने अस्तित्व की पहचान,
अपनी अपनी और अपनी ही हिंदी है !!

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