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“कलम का सिपाही” (प्रेमचंद) : लेखकीय दृष्टि

लेखकीय दृष्टि यदि अपने युगीन सामाजिक ,राजनीतिक ,धार्मिक,आर्थिक ,सांस्कृतिक दबावों ,घात –प्रतिघातों ,सम्बंधों में आती जटिलताओं के बीच मनुष्य की संपूर्णता में आत्मसात करते हुए जनाभिमुख और जनहित में अभिव्यक्त होती है तो वह सदैव प्रासांगिक बनी रहती है और… Read More

प्रेमचंद : कहानियों का सबसे बड़ा खिलाड़ी

कला केवल यथार्थ की नक़ल का नाम नहीं है कला दिखती तो यथार्थ है, पर यथार्थ होती नहीं उसकी खूबी यही है की यथार्थ मालूम हो……मुंशी प्रेमचंद             बीसवीं शती के संवेदनशील रचनाकार उर्दू से हिंदी भाषा में लिखने वाले… Read More

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वर्तमान समय में प्रेमचंद की प्रासंगिकता

प्रेमचंद को पढ़ना उन चुनौतियों को प्रत्यक्ष अनुभूत करना है, जिन्हें भारतीय समाज बीते काफी समय से झेलता आया है और आज भी उन चूनौतियों का हल नहीं ढूँढ पाया है। दलित, स्त्री, मजदूर, किसान, ऋणग्रस्तता, रिश्वतखोरी, विधवाएँ, बेमेल विवाह,… Read More

हिंदी साहित्य और सिनेमाई अनुवाद

अनुवाद किसी सीमा और देश तक सीमित नहीं हैं, उसकी महत्ता पूरे विश्वा में फैल चुकी है। भाषिक व्यापार के रूप में अनुवाद भारतीय परंपरा की द्रष्टि से कोई नई बात नहीं है। अनुवाद शब्द का संबंध ‘वद’ धातु से… Read More

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व्यंग्य: हँसी

टी.वी पर इंडिया के शीर्ष डॉक्टर्स का इंटरव्यू आ रहा था और उन सबने एक मत से जो एक वाक्य बोला वो ये था कि अगर स्वस्थ रहना चाहते हैं तो जितना हो सके उतना ज्यादा हँसें, खुश रहें। हँसने… Read More

THE LION KING : मूवी रिव्यू

हॉलीवुड फिल्मों की यह खूबी है कि इसमें एक बेहद सादी और सरल सी कहानी को एक शानदार तरीके से कहकर महफ़िल लूटी जा सकती है और द लायन किंग फ़िल्म यही कारनामा करती है। जंगल के राजा के सिंहासन… Read More

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कविता: लिहाफ़

रात बहुत सर्द थी सोचा लिहाफ़ लेलूं लेकिन, उस लिहाफ़ में बेख़बर वो भी लिपटी थी ऐसे में ख़्याल आया कहीं… कहीं उसकी नींद में खलल न हो जाए इसी ख़्याल से ठिठुरता रहा रात भर लेकिन एक सुकूँ था… Read More

ग़ज़ल: एक पल में हालात बदलते देखा है

एक पल में हालात बदलते देखा है साँझ से पहले सूरज ढलते देखा है… कल तक जो मुझपे जान लुटाते थे आज उन ही के हाथों में मैंने खंजर देखा है…। दिल के क्या हालात बताऊँ…? एक उदासी फैली है….… Read More

‘विज्ञापन मतलब उपभोक्तावाद’

“क़ानूनी तौर पर झूठ बोलने को विज्ञापन कहते हैं”- एच.जी.वेल्स फिल्मों के बाद जिसने सपनों और इंसानी रिश्तों, जज़बातों के साथ साथ उसके भावनाओं को सबसे ज्यादा कैश कराने का काम किया है उसमें विज्ञापनों की एक बहुत बड़ी दुनिया… Read More

शशि कपूर को ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’

जिस प्रकार बिहारी ने अपने एक मात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ से हिंदी साहित्य में जो मुकाम हासिल किया है, ठीक वैसे ही “मेरे पास माँ है” इस कालजयी संवाद के साथ हिंदी सिनेमा में शशि कपूर ने अपनी दमदार उपस्थिति… Read More