desh bhakti

कविता : रंग लाती है

तेरी मेहनत रंग लाई है तभी खुशियाँ घर आई है। आंगन में किलकारी गूँज रही और दिल में तरंगे छाई है। सच मानो जैसे आज ही घर में दिवाली आई है। सभी के दिलों में देखो अपार खुशियाँ छाई है।।… Read More

josh

कविता : उठो मन

उठो मन!अभी तुम्हें बहुत चलना है, कदम रखकर आगे अभी और बढ़ना है। कि अभी मंजिल न आयी है तुम्हारी भ्रम में रहकर न रुकना है। उठो मन! अभी तो तुम्हें फिर चलना है, विपरीत बहती धाराओं में तो अभी… Read More

kargil

कविता : भारत के जवान

सुनता हूँ जवानो की गाथा आज आँसुओं को भरके। गोलिया खाते है सीने पर घायल दिल होता है। चोट खाकर भी जवान हँसता मुकरता रहता है। खाई है जो कसम इन्होंने देश पर मर मिटने की।। आंच आने नहीं देंगे… Read More

young

कविता : सपने भी सच होते है

देख है जब से तुमको ये दिल बहुत बैचैन है। और दिल की धड़कने बहुत तेज हो रही। आँखो को भी एक खोज चल रही है। और चेहरे पर भी मेरे उदासी छा रही।। बहुत देखा है मैंने अपने इस… Read More

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कविता : मकर संक्रांति आई हैं

मकर संक्रांति आई हैं एक नई क्रांति लाई हैं निकलेंगे घरों से हम तोड़ बंधनों को सब जकड़ें हैं जिसमें सर्दी से बर्फ़ शीत की गर्दी से हटा तन से रजाई हैं मकर संक्रांति आई हैं एक नई क्रांति लाई… Read More

rista(1)

कवित : जीवन का गठ बंधन

तेरे मेरे मिलन से बहुत लोग खुश हो रहे। मानो जिंदगी अब मेरी मेरे ही पास आ गई। कर्म अच्छे किये थे इसलिए तुम्हें पाया। और मोरझाई जिंदगी को फिर से खिला पाया हूँ।। न करते प्यार मोहब्बत तुम तो… Read More

fasal

कविता : खेत छोड़ सड़कों पर बग़ावत की हैं

खेत छोड़ सड़कों पर बग़ावत की हैं किसानों ने संग्राम या सियासत की हैं, खेती किसानी का जो हाल ना जाने उसने भी इनके नाम हुकूमत की हैं, हमें छोड़कर बहकावें में यूँ ना जाओ फ़सलों ने किसानों से ज़ियारत… Read More

hindidiwas

लेख : हिंदी हैं हम

हिंदी हिंदुस्तान की बुद्धि और व्यवहार हिंदी हिंदुस्तान की भक्ति और सदभाव हिंदी के उदार उर में समाहित हैं सब भाषा भाव हिंदी हिंदुस्तान की मुक्ति और निर्वाण सबकों अपनें साथ लिए हिंदी चलती जाती हैं प्रगति के पथ पर… Read More

nazariya

कविता : एक दृष्टि

जंतुओं से इतना डर नहीं होता इस दुनिया में जितना उन मनुष्यों से और अपनों से होता है, जो पीछे से, चुपके से मीठी – मीठी बातों से, चोट दिल को आसानी से देते हैं, कठिन है अपनों से लड़ना… Read More

gayan

कविता : अजस्र श्रृंगार

छोड़ो शर्म को ,मुखर बनो तुम , बोलो हृदय के सब उद्गार । आसमान भी लगे फिर छोटा , उन्मुक्त उड़ोगे जब पंख परवाज । पनडुब्बे से तुम बन जाओ । अथाह सागर में गोत लगाओ । मोती ज्ञान के… Read More