shiv

कविता : धर्म कर्म का महीना

लगा है सावन का महीना विचारो में आस्था जगी है। धर्म की ज्योति भी देखो दिलों में जल उठी है। तभी तो सावन में देखो मंदिरो में भीड़ लगी है। और प्रभु दर्शन पाने की सभी में होड़ लगी है।।… Read More

kitab

कविता : रुको मत..पढ़ाई जारी रखो

पसंद नहीं है उन्हें, सहनते नहीं हैं वे दलितों का अच्छे कपड़े पहनना और चेस्मा लगाना, उनके जैसे अस्मिता का जीवन बिताना, गुलाम समझते हैं दलितों को हीन, नीच, अधम समझते हैं वे पुरखों से प्राप्त मूर्ख सांप्रदाय गौरव की… Read More

poem shiv maha yogi

कविता : शिव महायोगी

शिव प्रकट हुआ योगी सा बैठा पर्वत की शिखर पर अनुचर समझें ज्योति ब्रह्म का, देखें समीप में उनकों जाकर ध्यानस्थ योगी कहलाया शिव रुद्र समस्त जगत में बना उद्धारक पीड़ित जन का, अपनें अनुचर के संगत में शिव प्रेमी… Read More

sajan bin sawan

कविता : साजन बिन सावन

हो पिया जब परदेश में सावन भी सूखा लगता है सजनी का हर श्रृंगार भी पी बिन अधूरा लगता है बारिश की हरेक बूंद भी तब आग ही बन जाती है सावन की सुहानी रातों में जब याद पिया की… Read More

guru ji

कविता : गुरु

दीपक समान जलकर रोशनी जग में फैलाए। सच और झूठ बीच अन्तर का बोध कराके सही, गलत का फ़र्क  हमें सिखलाते। कभी संभाला तो कभी डांट लगाई माता-पिता सी, जिन्होंने। नए ज्ञान से अवगत कराके हमें सपनों को सच करने… Read More

hariyali

कविता : सावन-सुरंगा

सरस-सपन-सावन सरसाया। तन-मन उमंग और आनंद छाया। ‘अवनि’ ने ओढ़ी हरियाली, ‘नभ’ रिमझिम वर्षा ले आया। पुरवाई की शीतल ठंडक, सूर्यताप की तेजी, मंदक। पवन सरसती सुर में गाती, सुर-सावन-मल्हार सुनाती। बागों में बहारों का मेला, पतझड़ बाद मौसम अलबेला।… Read More

independence day

कविता : स्वतंत्रता दिवस

संग अपने हर्षोल्लास लेकर पुनः स्वतंत्रता दिवस आया है नमन उन वीरों को जिनके कारण हमने स्वतंत्र भारत पाया है जिनके शौर्य से परतंत्रता हारी स्वतंत्रता का हुआ था आगमन स्मरण करें उनके बलिदानों को देश के अमर जवानों को… Read More

manipur

कविता : आधी आबादी करे पुकार

‘भरी सभा सी’ दुनिया देखे, ‘वस्त्रविहीन-अबलाओं’ को। जाति-समाज के नाम पे किसने, बांट दिया भावनाओं को? बहन-बेटी की लूटती इज्जत, सभ्य समाज पर कलंक सी। कुछ दानव से क्यों मनुज ऐंठते, बस, मानवता का अंत ही? सजा मौत भी, कमतर… Read More

adat

कविता : जिंदा रहनी चाहिए

मेरी आँखों में क्यों तुम आँसू बनकर आ जाते हो। और अपनी याद मुझे आँखों से करवाते हो। मेरे गमो को आँसुओं के द्वारा निकलवा देते हो। और खुशी की लहर का अहसास करवा देते हो।। मुझे गमो में रहने… Read More

dipak

कविता : स्वर संगम

तुम क्यों वेबजाह आ कर दिलके तारो को बजा देती हो। और फिर कही खो जाती हो क्या मिलता है ये करके। न सुकून से खुद रहते हो और न हमें रहने देते हो। मुदत हो गई तुम्हें भूले फिर… Read More