duniya

कविता : देखा समझा और…

क्या क्या अब तक देख चुका। और क्या क्या देखना बाकी है। जीवन की इस राह पर क्या क्या सहना बाकी है। बंद आँख और मुँह कान इसका मूल आधार है।। गुमशुम रहना और सहना तेरा ये आधार नहीं। चलना… Read More

shadi

कविता : वो ही मनमीत चुनना तुम

स्थिरता हो मन में जिसके वो मनमीत चुनो तुम, ये चकाचौंध बहुत भटकाती है सादगी भा जाये जिसकी वो मनमीत चुनो तुम, ये दुनिया झूठे ख्वाब बहुत दिखाती है हर भावों को न तौलौ तुम समाज के दकियानूसी तराजू में,… Read More

rah

कविता : कह दो जुबान से

जो दिलमें होता है मेरे वो ही बात कहता हूँ। कहकर दिलकी बातों को सुकून बहुत मिलता है। इसलिए इस जमाने में लोग कम पसंद करते है। पर जो पसंद करते है वो बहुत अच्छे होते है।। मैं खुद को… Read More

prakati

लेख : पर्यावरण, मुँह के छाले और बुंदेलखंडी नुख्से

पिछले 4-5 दिनों से हमें बेजोड़ गर्मी से मुँह में बहुत ज्यादा छाले हो गए हैं क्योंकि आजकल हम संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के प्रोजेक्ट पर काम कर रहें हैं और भयंकर गर्मी में भी झाँसी जिले के गाँवों और… Read More

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कविता : विश्वगुरु भारत

चाहे लगाओ नारे या भरो हुंकार ये देश नहीं बदल पाएगा, भारत का हर नागरिक बिस्मिल, विवेकानंद बन जाएगा हर विश्वविद्यालय से  देशभक्त निकल के आयेगा तब भारत देश हमारा विश्वगुरु बन पाएगा जब हर बेटा भारत माँ की लाज… Read More

vairus

लेख : कोरोना का बढ़ता प्रकोप

पिछले साल लाकडाउन के बाद देश ने दूसरे देशों की तुलना में अपने आपको संभाल लिया था। इस बार कोरोना संक्रमण की गति फिर से तेज हो गई है। अब पिछले वर्ष 6 माह में जितने मरीज मिले , उतने… Read More

saree

कविता : साड़ी

साड़ी सिर्फ़ परिधान नहीं स्त्री गौरव की भी शान है, साड़ी विश्व में भारतीय नारियों का मान सम्मान स्वाभिमान है। साड़ी में नारियों का सौंदर्य निखरता है शक्ल सूरत सामान्य भी तो भी साड़ी में नारी का रुप खिला लगता… Read More

zindagi(2)

कविता : जिंदगी के पल

जिंदगी कितनी हसीन और साथ ही रंगीन है। जिसमें हर रस का जो समावेश है। न चाह कर भी हम स्वयं रंगीन होते है। और हर रस को खुशी से पी लेते है।। क्यों उदासी से जीते है अपनी इस… Read More

yadee

कहानी : बचपन की पतोहू

बचपन से उनको मुझे अपनी बहु बनाने का बहुत शौक था इसलिए वो मुझे पतोहू कहकर बुलाती थी, जबसे मैंने होश संभाला तबसे मुझे उसी नाम से उन्हें पुकारते हुए सुना है। मैं बहुत छोटी थी, मेरे डैडी और उनके… Read More

sunya

कविता : विचारों के कारखाने में

क्या है मेरे अंदर छिपाने का बाल्य काल से ही मैं नंगा था पुस्तकों में मस्तक लगाके ढ़ूँढ़ता था- मैं अपने आपको, आंतरिक दुनिया में, कौन हूँ मैं आखिर, विचार कई थे मेरे चक्कर काटने लगे, पागल था मैं… पुस्तकालय… Read More