ढाई आखर का शब्द ‘प्रेम’ विश्व साहित्य में शायद सर्वाधिक चर्चित या कि विवादित रहता आया है। पुराख्यानों से लगायत अधुनातन साहित्य तक काव्य और कथा सर्जना के केन्द्रीय तत्व के रूप में प्रेम को व्यापक स्वीकृति एवं अभिव्यक्ति मिलना… Read More
ढाई आखर का शब्द ‘प्रेम’ विश्व साहित्य में शायद सर्वाधिक चर्चित या कि विवादित रहता आया है। पुराख्यानों से लगायत अधुनातन साहित्य तक काव्य और कथा सर्जना के केन्द्रीय तत्व के रूप में प्रेम को व्यापक स्वीकृति एवं अभिव्यक्ति मिलना… Read More
लक्ष्मीबाई कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में बीते 18-19 सितंबर को ‘मीडिया और लोकतंत्र‘ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। दो दिवसीय कार्यक्रम में उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रो.कैलाश नारायण तिवारी, मुख्य अतिथि सांसद मनोज तिवारी, वक्ता के रूप दक्षिण भारत… Read More
22.09.2019 को तुलसी साहित्यिक एवं सामाजिक संस्था बदायूँ के तत्वावधान में राजकीय महाविद्यालय में भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें संस्था के वरिष्ठ उपाध्यक्ष आमोद मिश्रा की अध्यक्षता एवं देख रेख में संपन्न हुई। मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता हरिप्रताप… Read More
14 सितंबर से हिंदी पखवाड़ा दिवस शुरू हुआ है तो बदायूं के सभी साहित्यकारो ने एक मत होकर कहा कि आज के दिन ही भारतीय संविधान सभा द्वारा हिंदी को राज्य की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया वरन्… Read More
मेरी बेटी, मेरी जान ! तुम सर्दी में इतनी सुंदर क्यों हो जाती हो मेरी बेटी गोल-मटोल स्कार्फ बांध कर नन्हीलाल चुन्नी जैसी नटखट क्यों बन जाती हो मेरी बेटी मेरी बेटी, मेरी जान, मेरी भगवान, मेरी परी, मेरी आन,… Read More
यू ट्यूब पर जाइए हजारों वीडियो मिल जाएंगे जहां लोग वैलेनटाईन डे का इतिहास बता दे रहे हैं मगर उन्हें 26 जनवरी गणतंत्रत दिवस और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस में फर्क नहीं पता। यहां तक कि ये भी नहीं पता… Read More
कला एवं विज्ञान महाविद्यालय, शिवाजी नगर (गढी), जिला बीड के हिंदी विभाग द्वारा हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित समापन समारोह (16 सितंबर, 2019) में प्रमुख अतिथि के रूप में डॉ. मजीद शेख को निमंत्रित किया गया था। इनके द्वारा… Read More
आज से 36 साल पहले ‘बेताब’ फ़िल्म के ढाई किलो के हाथ वाले डायलॉग से आज भी सिने प्रेमियों के दिल में जगह कायम रखने वाले सनी देओल के बेटे करण देओल ने सिनेमा की दुनिया में कदम रख दिया… Read More
यह दोनों गीत 1987 में लिखे गए थे । इन गीतों की एक पृष्ठभूमि थी । डॉ. धर्मवीर भारती ने इन दोनों गीतों को धर्मयुग के 15 मार्च 1987 अंक में पृष्ठ 19 पर छापा था । आज पत्रिकाओं के… Read More