मुसीबत का पहाड़, कितना भी बड़ा हो। पर मन का यकीन, उसे भेद देता है। मुसीबतों के पहाड़ों को, ढह देता है। और अपने कर्म पर, जो भरोसा रखता है।। सांसारिक उलझनों में, उलझा रहने वाला इंसान। यदि… Read More
मुसीबत का पहाड़, कितना भी बड़ा हो। पर मन का यकीन, उसे भेद देता है। मुसीबतों के पहाड़ों को, ढह देता है। और अपने कर्म पर, जो भरोसा रखता है।। सांसारिक उलझनों में, उलझा रहने वाला इंसान। यदि… Read More
निःशब्द हूँ… कि क्या हुआ ये क्यो हुआ हुआ अगर ये जो भी तो गुनहगार कौन है? नि:शब्द हूँ… क़ायनात ने दिया, तो नोच लूं निचोड़ लूं कर सकूं अगर कभी तो रुख हवा का मोड़ लूं। निःशब्द हूँ… खेल… Read More
जहाँ से इसकी शुरुआत हुई उस शहर का नाम वुहान है, आज महामारी बन चुका है ये और चपेट में सारा जहान है। दफ्तर बन्द हो गए सभी और सड़के भी वीरान है, घरों में दुबक चुके हैं लोग और… Read More
जिन्दगी में सदा, मुस्कराते रहो। फासले कम करो, दिल मिलाते रहो। जिन्दगी में सदा, मुस्कराते रहो..….।। दर्द कैसा भी हो, आँख नम ना करो। रात काली सही, कोई गम न करो। एक सितारा बनो, जग मगाते रहो। फासले कम करो, … Read More
हमने गरीब बन कर जन्म नहीं लिया था हां, अमीरी हमें विरासत में नहीं मिली थी हमारी क्षमताओं को परखने से पूर्व ही हमें गरीब घोषित कर दिया गया किंतु फिर भी हमने इसे स्वीकार नहीं किया कुदाल उठाया, धरती… Read More
विध्वंसक धुंध से आच्छादित दिख रहा सृष्टि सर्वत्र किंतु होता नहीं मानव सचेत कभी प्रहार से पूर्वत्र सदियों तक रहकर मौन प्रकृति सहती अत्याचार करके क्षमा अपकर्मों को मानुष से करती प्यार आती जब भी पराकाष्ठा पर मनुज का अभिमान… Read More
तू कर सके तो ऐसा क़र कि नाम हो तेरा काम हो.. तू धूप बन, तू छाव बन जिसकी जरुरत आन हो ।। तू आग बन कुछ इस तरह कि ठण्ड की कोई शाम हो। तू लौ बने अंधेरों की… Read More
समझ नहीं आता हम भारत को कैसे स्वच्छ करें? क्या वही थी वो गंगा, अविरल सी बहती, जहाँ वायु में शुद्धता का समावेश था। कितना सुंदर था हमारा भारत कितना स्वच्छ था हमारा भारत पूरे विश्व में शुद्धता का परिमाण… Read More
दिल की चाह मान सम्मान, पाने की कभी नहीं रही। लिखा मेरा शौक है, और हिंदी मेरी माँ हैं। इसलिए विश्व की ऊंचाईयां, मां को दिलाना चाहता हूँ। और माँभारती की सेवा करना, अपना फर्ज समझता हूँ।। इसलिए में साफ… Read More
दिखती है जिसमें मां की प्रतिच्छवि वह कोई और नहीं होती है बान्धवि जानती है पढ़ना भ्राता का अंतर्मन अंतर्यामी होती है ममतामयी बहन है जीवन धरा पर जब तक है वेगिनी उत्सवों में उल्लास भर देती है भगिनी +120