lonely boy

कविता : दिल करता है मेरा

ना जीने को दिल करता है, ना हीं मर जाने को, दिल करता है मेरा, सुन्दर – सा नगर बसाने को । जहाँ ना हो चोरी ड़कैती, ना हीं हो मर महँगाई की; जहाँ पाप समझे सब खाना, कमाई हराम… Read More

bhanwar jaal

कविता : भंवर जाल

बनाकर आशियाना अपनी मोहब्बत का, क्यों तुम गिरा रहे हो। जमाने के डर से शायद, तुम भाग रहे हो। और लोगो के भंवर जाल में, तुम फँस गये हो। और अपनी मोहब्बत का, जनाजा खुद निकल रहे हो।। ये दुनियाँ… Read More

kisan

कविता : किसान की व्यथा

मैं किसान हूँ  अब आपने अनुमान लगा ही लिया होगा कि मेरे पिता एवं पितामह भी अवश्य ही किसान रहे होंगे आपका अनुमान सही है श्रीमान  मेरे पूर्वज भी थे किसान किसान का पुत्र किसान हो या ना हो किसान… Read More

poem mansoon sawan

कविता : सावन

पिपासा तृप्त करने प्यासी धरा की बादल प्रेम सुधा बरसाने आया है अब तुम भी आ जाओ मेरे जीवन प्रेमाग्नि जलाने सावन आया है देखकर भू की मनोहर हरियाली नभ के हिय में प्रेम उमड़ आया है रिमझिम फुहारें पड़ीं… Read More

son holding hand his father

कविता : वो तो भूल गए

वो तो भूल गए कि उनको, बनाया किसने था चलना पकड़ के ऊँगली, सिखाया किसने था वो कहते हैं कि मंज़िल क़रीब है उनकी अब, पर भूल गए कि ये रास्ता, दिखाया किसने था होते हैं बहुत खुश जब देखते… Read More

कविता : बारिश

कल रात जब वो आई थी घर मेरे तब होने लगी थी बेमौसम बारिश सिर्फ़ संयोग था बादलों का बरसना या थी कुदरत की वह एक साज़िश। मिली थी वह मुझसे पिछले बरस ही पर हम अब तक मिल ना… Read More

banner-poem-shram-ki-murat

कविता : श्रम की मूरत

श्रम की मूरत, छली गई है अलग अलग के दौर में जब संकट आया भू, पर मलाई उड़ाई किसी और ने छलिया है चालाक बहुत पल में गुस्सा पल में आँसू हँस- हँसकर बातें करता अंदर बाहर में चेहरा लटका… Read More

poem bhula na sake hum

कविता : जिसे भूल कर भी भुला ना सके हम

जिसे भूल कर भी भुला ना सके हम, ‘मनोहर’ उसे ना फिर कभी याद आ सके हम, जिसे भूल कर भी …. यूँ बातें बहोत की बिना बात की, पर हाल ए दिल अपना बता ना सके हम, जिसे भूल… Read More

poem chalne to mujhe

कविता : चलने दो मुझे

जलता हूँ मैं अपने आपमें अक्षर बन जाता हूँ नित्य प्रज्ज्वलित ज्वाला मेरे बनते हैं अक्षर प्रखर असमानता, अत्याचारों के विरूद्ध आवाज़ बनकर आते हैं ये मेरे प्रखंड प्राणाक्षर पंचशील का हूँ मैं साधना में अल्प की दृष्टि से देखो… Read More

कविता : कुछ सपने थे जो टूट गए

कुछ सपने थे जो टूट गए, कुछ अपने थे जो छूट गए, पहले तो कुछ ना आभास था, यह भी होगा, ना विश्वास था, पर होनी तो होकर गुजरी, सब सगे स्नेह से लूट गए, कुछ सपने थे जो टूट… Read More