मिश्री जैसी मधुर है हमारी बोली हम प्रेमी पान मखान और आम के भगवती भी जहाँ अवतरित हुईं हम वासी हैं उस मिथिला धाम के संतानों को जगाने मिथिला की माएँ सूर्योदय से पूर्व गाती हैं प्रभाती सुनाकर कहानियाँ ज्ञानवर्धक… Read More
मिश्री जैसी मधुर है हमारी बोली हम प्रेमी पान मखान और आम के भगवती भी जहाँ अवतरित हुईं हम वासी हैं उस मिथिला धाम के संतानों को जगाने मिथिला की माएँ सूर्योदय से पूर्व गाती हैं प्रभाती सुनाकर कहानियाँ ज्ञानवर्धक… Read More
मैं समाज से बोलता हूँ दुनिया से बोलता हूँ मनुष्य से बोलता हूँ मेरे पास वह शक्ति नहीं उन भेड़ियों से बोलने का कुटिल तंत्रों के साथ लड़ने का होने दो मुझ पर इनके नादान परिहास रचने दो मंत्र –… Read More
मिश्री जैसी मधुर है हमारी बोली हम प्रेमी पान मखान और आम के भगवती भी जहाँ अवतरित हुईं हम वासी हैं उस मिथिला धाम के संतानों को जगाने मिथिला की माएँ सूर्योदय से पूर्व गाती हैं प्रभाती सुनाकर कहानियाँ ज्ञानवर्धक… Read More
तेरी यादों को अब तक, दिल से लगाये बैठा हूँ। सपनो की दुनियां में, अभी तक डूबा हुआ हूँ। दिलको यकीन नही होता, की तुम गैर की हो चुकी हो। और हकीकत की दुनियां से, बहुत दूर निकल गई हो।।… Read More
आँखे झूठी, बातें झूठी, चेहरा सारा झूठा है, बाहर अंदर सारा झूठा, ईमां ही तेरा झूठा है । इस चेहरे के उपर न जाने, और भी कितनी कालिमाई है, कपट की लहरें तेरे भीतर, ना जाने कितनी गहराई हैं ।… Read More
सोने ने पुछा एक दिन लोहे से, तू चोट लगने पर इतना चिल्लाता क्यूं है? जबकि सुनार मुझे भी तो, हतौडे से ही चोट मारता है । इतना सुनना था कि लोहे का मुख मलीन हो गया, मामला अत्यंत संगीन… Read More
दिल से दिल मिलाकर देखो। जिंदगी की हकीकत को पहचानो। अपना तुपना करना भूल जाओगे। और आखिर एक ही पेड़ की छाया के नीचे आओगे। और अपने आप को तुम तब अपने आप को पहचान पाओगे।। क्योकि छोड़कर नसवार शरीर,… Read More
इस विदाई की बेला मे, कहता हूँ उपस्थित सभी से, करने की ईश्वर से प्रार्थना, करने की जीवन में कुछ ऐसा, जो कल्याणकारी और आदर्श हो सबका, करें आज हम समय से यही कामना, लेकर माता – पिता और गुरु… Read More
मेरे जीवन में जब तक माँ मेरे साथ थी मैं कभी भी उस तरह से उसे नहीं देख सका जिस तरह से मुझे जन्म देकर उसने देखा था ना ही कभी सुन सका मैं उसकी तरह क्योंकि वह हृदय से… Read More
सेज सुहाग पर, सुहाग के लाल जोड़े में, मेंहंदी तेरे नाम की रचाये, शर्म की घुंघट ओढ़े, बैठी थी तेरे इंतजार में, तुम जो धीरे से आये, इस चाँद से मुखड़े को, पास बैठ लेकर हांथों में, मुसकुराये, घुंघट उठाये,… Read More