खेल खेलो ऐसा की किसी को समझ न आये। लूट जाये सब कुछ कोई समझ न पाए। कर्ताधर्ता कोई और है पर दाग और पर लग जाये। और मकरो का रास्ता आगे साफ हो जाये।। देश का परिदृश्य अब बदल… Read More
खेल खेलो ऐसा की किसी को समझ न आये। लूट जाये सब कुछ कोई समझ न पाए। कर्ताधर्ता कोई और है पर दाग और पर लग जाये। और मकरो का रास्ता आगे साफ हो जाये।। देश का परिदृश्य अब बदल… Read More
वो देखती है सपने, रात रात भर जाग के, चाँद तारों को आसमां में निहारते, वो देखती है सपने । वो देखती है सपने, अपने पिया से मिलन के, अपने विह्वल मन को समझाते, वो देखती है सपने । वो… Read More
सन् निन्यानवे था थी वो माह जुलाई शत्रु से हमारी पुनः छिड़ी हुई थी लड़ाई मार रहे थे शत्रुओं को हमारे वीर महान् राष्ट्र की रक्षा हेतु दे रहे थे बलिदान दिन सोमवार था वो तिथि छब्बीस जुलाई कारगिल पर… Read More
हंसनेवालों को हंसने दो यह नयी बात तो नहीं अपने रास्ते पर चलनेवालों को मैं फिसलता हूँ, गिरता हूँ लड़खड़ाता हूँ तो क्या विचारों की दुनिया में एक स्वतंत्रता है, अंतर्वस्तु है मेरी सामाजिक चिंतन में समर्पित हूँ अपना कुछ… Read More
ज़माना “हम सब ज़माने की शर्तों पर चल रहे है, जैसे पान में कत्थे के संग चुना मल रहे है, वक़्त बदला नही है किसी का अभी तक, लेकिन हम सब वक़्त के साथ बदल रहे है।” लेखन “अभी लेखन… Read More
मोहब्बत का एक संदेश, तुम्हे हम भेज रहे है। लगाकर दिलसे तुम इसे, रख लेना अपने पास। फिर भी याद आये तो, बुला लेना दिलसे तुम। मैं आ जाऊंगा तुम्हारे पास, बुलाना सच्चे मनसे तुम।। बहुत गहरी होती है, मोहब्बत… Read More
ओढ़कर प्यार की चुनरिया, चांदनी रात में निकलती हो। तो देखकर चांद भी थोड़ा, मुस्कराता और शर्माता है। और हाले दिल तुम्हारा, पूछने को पास आता है। हंसकर तुम क्या कह देती हो, की रात ढलते लौट जाता है।। चांदनी… Read More
किसी का क्या जो कदमो पर, जबी ए बंदगी रख दी। हमारी चीज थी हमने, जहाँ जानी वहां रख दी। जो दिल माँगा तो वो बोले, ठहरो याद करने दो। जरा सी चीज थी हमने, न जाने कहाँ रख दी।।… Read More
चाह नहीं मैं एम.पी. बनकर, संसद में बहस लगाऊँ चाह नहीं मैं वक्ता बनकर, दुनिया को हीं मूर्ख बनाऊँ चाह नहीं मैं पहलवान बनकर, कमजोरों को खूब सताऊँ चाह नहीं मैं मालिक बनकर, ऑर्डर नौकर पर बेहिसाब चलाऊँ चाह नहीं… Read More
समय ने चली अपनी चाल, बिखर गये बड़े बड़े विध्दामान। न धर्म काम आया किसी का, न काम आया अब ये विज्ञान। बहुत छेड़छाड़ कर रहे थे, प्राकृतिक सनसाधन और संपदा का। तो स्वंय प्रकृति ने ही, रच दिया माहामारी… Read More