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कविता : आधी आबादी करे पुकार

‘भरी सभा सी’ दुनिया देखे, ‘वस्त्रविहीन-अबलाओं’ को। जाति-समाज के नाम पे किसने, बांट दिया भावनाओं को? बहन-बेटी की लूटती इज्जत, सभ्य समाज पर कलंक सी। कुछ दानव से क्यों मनुज ऐंठते, बस, मानवता का अंत ही? सजा मौत भी, कमतर… Read More

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लेख : पुजारिन

साहित्य को बचपन युवा और प्रौढ़ कि जीवन यात्रा के रूप में समाज राष्ट्र में भाष भाव के समन्वय और और सामाजिक परिपेक्ष्य में रिश्तों में उसके महत्व को समझने में कहानीकार डॉ पालरिया का कोई जोड़ नहीं है डस्टबिन… Read More

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लेख : रिश्तों का इंद्र धनुष

समाज में रिश्तों के बनते बिगड़ते आयाम और उसमे बिभिन्न मानवीय सम्बदनाओं को आज के स्पष्ट और भौतिकतवादी युग में उतार चढ़ाव कि मार्मिकता और कठोरता के सापेक्ष एक प्रयोगिग सत्य सन्देश यह कहानी देती है जहा व्यक्ति का स्वार्थ… Read More

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व्यंग्य : हिँडी

मोहेश कुमारे भारत सरकार को बरसों से दुहते आये हैं , पूरे देश के हर आलीशान हिंदी सम्मेलन में इनकी उपस्थिति उसी तरह अनिवार्य होती है जैसे नाई और पंडित के बिना सनातन विवाह सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो… Read More

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कविता : जिंदा रहनी चाहिए

मेरी आँखों में क्यों तुम आँसू बनकर आ जाते हो। और अपनी याद मुझे आँखों से करवाते हो। मेरे गमो को आँसुओं के द्वारा निकलवा देते हो। और खुशी की लहर का अहसास करवा देते हो।। मुझे गमो में रहने… Read More

dipak

कविता : स्वर संगम

तुम क्यों वेबजाह आ कर दिलके तारो को बजा देती हो। और फिर कही खो जाती हो क्या मिलता है ये करके। न सुकून से खुद रहते हो और न हमें रहने देते हो। मुदत हो गई तुम्हें भूले फिर… Read More

akhe

कविता: आँखें

आज की दुनिया में बहुत कम लोग अपनी आँखों से देख पाते हैं कई लोग, चेस्मा के बगैर बाहर कदम भी नहीं ले पाते हैं, कुछ लोग भविष्य को देखने में सक्षम होते हैं, दूसरे के अंतरंग में जाना, यथार्थ… Read More

akh

कविता : आँखो का खेल

मिलाकर आँखे किसी से लुभा उनको लेते है। दिल की गैहरीयों में बसा उनको लेते है। और दिलकी धड़कनो में शमा उनको लेते है। फिर दो आत्माओं का मिलन करा देते है।। मोहब्बत करने वालो का निराला अंदाज होता है।… Read More

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लेख : खूबसूरत मन

खूबसूरत तन महत्व्पूर्ण है या खूबसूरत मन मूल्यवान खूबसूरत मन ईश्वर द्वारा प्रदत्त विरासत है जो प्राणी को सांसों धड़कन के शारीरिक अस्तित्व के अहंकार से  अभिभूत कर आचरण कि संस्कृति संस्कार से बिमुख कर जीवन को भौतिकता के चकाचौध… Read More

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कविया :श्रीराम श्रीकृष्ण मिले

चलते चलते मुझे श्रीराम मिल गये । चलते चलते मुझे श्रीकृष्ण मिल गये । बातों ही बातों में वो पूछने लगे। क्या करते हो तुम? मैने कहाँ की मैं एक कवि हूँ जी। सुनकर दोनो जन जोर से हंस पड़े।… Read More