‘भरी सभा सी’ दुनिया देखे, ‘वस्त्रविहीन-अबलाओं’ को। जाति-समाज के नाम पे किसने, बांट दिया भावनाओं को? बहन-बेटी की लूटती इज्जत, सभ्य समाज पर कलंक सी। कुछ दानव से क्यों मनुज ऐंठते, बस, मानवता का अंत ही? सजा मौत भी, कमतर… Read More
‘भरी सभा सी’ दुनिया देखे, ‘वस्त्रविहीन-अबलाओं’ को। जाति-समाज के नाम पे किसने, बांट दिया भावनाओं को? बहन-बेटी की लूटती इज्जत, सभ्य समाज पर कलंक सी। कुछ दानव से क्यों मनुज ऐंठते, बस, मानवता का अंत ही? सजा मौत भी, कमतर… Read More
साहित्य को बचपन युवा और प्रौढ़ कि जीवन यात्रा के रूप में समाज राष्ट्र में भाष भाव के समन्वय और और सामाजिक परिपेक्ष्य में रिश्तों में उसके महत्व को समझने में कहानीकार डॉ पालरिया का कोई जोड़ नहीं है डस्टबिन… Read More
समाज में रिश्तों के बनते बिगड़ते आयाम और उसमे बिभिन्न मानवीय सम्बदनाओं को आज के स्पष्ट और भौतिकतवादी युग में उतार चढ़ाव कि मार्मिकता और कठोरता के सापेक्ष एक प्रयोगिग सत्य सन्देश यह कहानी देती है जहा व्यक्ति का स्वार्थ… Read More
मोहेश कुमारे भारत सरकार को बरसों से दुहते आये हैं , पूरे देश के हर आलीशान हिंदी सम्मेलन में इनकी उपस्थिति उसी तरह अनिवार्य होती है जैसे नाई और पंडित के बिना सनातन विवाह सुचारू रूप से सम्पन्न नहीं हो… Read More
मेरी आँखों में क्यों तुम आँसू बनकर आ जाते हो। और अपनी याद मुझे आँखों से करवाते हो। मेरे गमो को आँसुओं के द्वारा निकलवा देते हो। और खुशी की लहर का अहसास करवा देते हो।। मुझे गमो में रहने… Read More
तुम क्यों वेबजाह आ कर दिलके तारो को बजा देती हो। और फिर कही खो जाती हो क्या मिलता है ये करके। न सुकून से खुद रहते हो और न हमें रहने देते हो। मुदत हो गई तुम्हें भूले फिर… Read More
आज की दुनिया में बहुत कम लोग अपनी आँखों से देख पाते हैं कई लोग, चेस्मा के बगैर बाहर कदम भी नहीं ले पाते हैं, कुछ लोग भविष्य को देखने में सक्षम होते हैं, दूसरे के अंतरंग में जाना, यथार्थ… Read More
मिलाकर आँखे किसी से लुभा उनको लेते है। दिल की गैहरीयों में बसा उनको लेते है। और दिलकी धड़कनो में शमा उनको लेते है। फिर दो आत्माओं का मिलन करा देते है।। मोहब्बत करने वालो का निराला अंदाज होता है।… Read More
खूबसूरत तन महत्व्पूर्ण है या खूबसूरत मन मूल्यवान खूबसूरत मन ईश्वर द्वारा प्रदत्त विरासत है जो प्राणी को सांसों धड़कन के शारीरिक अस्तित्व के अहंकार से अभिभूत कर आचरण कि संस्कृति संस्कार से बिमुख कर जीवन को भौतिकता के चकाचौध… Read More
चलते चलते मुझे श्रीराम मिल गये । चलते चलते मुझे श्रीकृष्ण मिल गये । बातों ही बातों में वो पूछने लगे। क्या करते हो तुम? मैने कहाँ की मैं एक कवि हूँ जी। सुनकर दोनो जन जोर से हंस पड़े।… Read More