कविता : भावनाओं से मत खेलो

न राम चाहिए, न श्याम चाहिए। हम लोगो को तो, कोरोना से निजात चाहिए। है कोई ऐसा मंत्र, अब तांत्रिकों पर। जो इसका बीमारी का इलाज कर सके।। भविष्यवाणी करने वालो, कहा पर तुम सब सो गये। क्या अब कोरोना… Read More

कविता : जय श्री राम

त्याग का पर्याय  प्रतीक शौर्य का  पुरुषों में उत्तम संहर्ता क्रौर्य का परहित प्रियता  भ्राताओं में ज्येष्ठ  कर्तव्य परायण नृप सर्वश्रेष्ठ शरणागत वत्सल  हैं आश्रयदाता  दशरथ नंदन भाग्य विधाता भजे मुख मेरा  तेरा ही नाम  जय सिया राम जय श्री… Read More

लेख : मार्च महीना और महामारी…!!

 आमतौर पर मार्च का महीना साल का सबसे तनावपूर्ण महीना माना जाता है क्योंकि इस महीने में अधिकतम निजी व्यावसायिक कंपनियों में वर्ष समाप्ति का काम ज़ोरो पर होता है और कर्मचारियों पर काफी दबाव भी रहता है, रही बात… Read More

कविता : कुछ दिन

जहाँ से इसकी शुरुआत हुई उस शहर का नाम वुहान है, आज महामारी बन चुका है ये और चपेट में सारा जहान है। दफ्तर बन्द हो गए सभी और सड़के भी वीरान है, घरों में दुबक चुके हैं लोग और… Read More

कविता : यकीन

मुसीबत का पहाड़,  कितना भी बड़ा हो। पर मन का यकीन, उसे भेद देता है। मुसीबतों के पहाड़ों को, ढह देता है। और अपने कर्म पर, जो भरोसा रखता है।। सांसारिक उलझनों में,      उलझा रहने वाला इंसान। यदि… Read More

कविता : नि: शब्द हूँ

निःशब्द हूँ… कि क्या हुआ ये क्यो हुआ हुआ अगर ये जो भी तो गुनहगार कौन है? नि:शब्द हूँ… क़ायनात ने दिया, तो नोच लूं निचोड़ लूं कर सकूं अगर कभी तो रुख हवा का मोड़ लूं। निःशब्द हूँ… खेल… Read More

कविता : कुछ दिन

जहाँ से इसकी शुरुआत हुई उस शहर का नाम वुहान है, आज महामारी बन चुका है ये और चपेट में सारा जहान है। दफ्तर बन्द हो गए सभी और सड़के भी वीरान है, घरों में दुबक चुके हैं लोग और… Read More

कविता : मुस्कुराते रहो

जिन्दगी में सदा,  मुस्कराते रहो। फासले कम करो, दिल मिलाते रहो। जिन्दगी में सदा, मुस्कराते रहो..….।। दर्द कैसा भी हो,  आँख नम ना करो। रात काली सही, कोई गम न करो। एक सितारा बनो,  जग मगाते रहो। फासले कम करो, … Read More

कविता : पलायन का जन्म

हमने गरीब बन कर जन्म नहीं लिया था  हां, अमीरी हमें विरासत में नहीं मिली थी  हमारी क्षमताओं को परखने से पूर्व ही हमें गरीब घोषित कर दिया गया किंतु फिर भी हमने इसे स्वीकार नहीं किया कुदाल उठाया, धरती… Read More

Nature

कविता : प्रकृति

विध्वंसक धुंध से आच्छादित दिख रहा सृष्टि सर्वत्र किंतु होता नहीं मानव सचेत कभी प्रहार से पूर्वत्र सदियों तक रहकर मौन प्रकृति सहती अत्याचार करके क्षमा अपकर्मों को मानुष से करती प्यार आती जब भी पराकाष्ठा पर मनुज का अभिमान… Read More