कहानी : सदमा

दो महीने हो गये। शांति देवी की हालत में कुछ भी सुधार ना हुआ। पुरुषोत्तम बाबू को उनके मित्रों और रिश्तेदारों ने सुझाव दिया कि एक बार अपनी पत्नी को मनोचिकित्सक से दिखवा लें। पुरुषोत्तम बाबू को सुझाव सही लगा।… Read More

अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष

हिंदी का हित/अहित करती हिंदी संस्थाएं प्रत्येक हिंदी सेवी संस्था दम भरती है कि एक वही संस्था है जो हिंदी के लिये पूर्णत: और सत्य के अंतिम छोर तक समर्पित है, बाकी की संस्थाएं तो हिंदी के नाम पर पैसा… Read More

गीत : गुरु और शिष्य

गुरु शिष्य का हो, मिलन यहां पर, फिर से दोवारा। यही प्रार्थना है हमारा। यही प्रार्थना है हमारा।। गुरु चाहते है, कि शिष्य को, मिले वो सब कुछ। जो में हासिल, कर न सका, अपने जीवन में। वो शिष्य हमारा,… Read More

गीता में वर्णित कर्मयोग की वर्तमान में प्रासांगिकता

अति प्राचीन भारत की राष्ट्रीयता के मूल स्वरूप की सांस्कृतिकता को कोई भी आँधी आज तक हिला भी नहीं पाई है। इसीलिए शायद उर्दू कवि इकबाल कहते हैं। ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ यही हमारी राष्ट्रीयता हमारी… Read More

कविता : यादों के लिए

तेरी यादों को अभी तक, दिल से लगाये बैठा हूँ। की तुम लौटकर आओगे। मेरे लिए नहीं सही तो, परायें के लिए ही सही। तभी आप की धरोहर, आप को सौप देंगे। और इस मतलबी दुनियाँ से, कुछ कहे बिना… Read More

गीत : मैं तो हूं केवल अक्षर

मैं तो हूं केवल अक्षर  तुम चाहो शब्दकोश बना दो  लगता वीराना मुझको अब तो ये सारा शहर याद तू आये मुझको हर दिन आठों पहर जब चाहे छू ले साहिल वो लहर सरफ़रोश बना दो अगर दे साथ तू… Read More

कविता : उड़ने के लिए

ला दो मुझे भी वो पंख उड़ने के लिए, पंख पसारकर हर ऊँचाई। पंखों के बिन उड़ना कैसा? उम्मीद के बिन ठहरना कैसा? उम्मीद की कली है खिलने दो न मुझमें, पंख पसारकर उड़ने दो न मुझे! आएगा एक दिन… Read More

कविता : चलती हूँ कुछ दूर

चलती हूँ कुछ दूर, पाँव रुक जाते है। मंजिल पर पहुँचने से पहले, हालात बिगड़ जाते है। बहुतों को देखा है, लिखते अपनी कहानी। हम जब लिखते है, हमारे हाथ रुक जाते है। बैठें थे जब लिखनें वो ऊपरवाले, क़िस्मत… Read More

कविता : भारत में

भारत में पूर्ण सत्य  कोई नहीं लिखता  अगर कभी किसी ने लिख दिया तो कहीं भी उसका प्रकाशन नहीं दिखता यदि पूर्ण सत्य को प्रकाशित करने की  हो गई किसी की हिम्मत  तो लोगों से बर्दाश्त नहीं होता और फिर… Read More

मूवी रिव्यू : उलझी उलझी लव आज कल

फिल्म : लव आज कल   लव आजकल 2 फ़िल्म पिछले वाली लव आजकल जैसी ही हूबहू है। इसलिए अगर आपने लव आजकल देखी है तो इसे देखने या समझने की भूल मत कीजिएगा। अगर आपको यह लगता है कि कल्पना… Read More