nirwan

जन्मी उर में जिज्ञासाएँ,
देखा जब निस्सार जगत;
पीड़ा मानव मन की देखी,
शूल हृदय में था चुभा।
“उर्वरा थी भूमि मन की,
बीज जा उसमें गिरा।।”

उठी हूक अंतःस्थल में,
ये कहां हम आ गए?
छोड़ सारे वैभवों को,
था गमन वन को किया।

क्या सुकोमल यशोधरा का,
खयाल भी ना आया उन्हें?
पुत्र मोह ने भी क्या,
तनिक ना लुभाया उन्हें?
क्या कहे कोई…..रचित
प्रारब्ध का ये खेल था,

“आज तो सिद्धार्थ दृढ़ हो,
बुद्ध होने ही चला।।”

बैठकर वट वृक्ष नीचे,
स्वयं को पाया ज्ञान से;
त्याग सारे बंधनों को,
बाँधध डाला ध्यान से;
वह जगत में ज्ञान की,
ज्योति जगाने आए थे;
“सूक्ष्म, उर के स्पंदनों को भी,
जिन्होंने था जिया।।”

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