mukti

विकास रहता है आजकल
आकाश छूती इमारतों में,
भव्य मोटर-गाड़ियों में,
शायद उसे वैभव पसंद है।
विकास घूमता है बेफिकर
पहन कर बरमूडा और निक्कर
चौड़ी सड़को में,
उसे आकार भी वृहद पसंद है ।
विकास दिखता है
आधुनिक तकनीकी यंत्रों में,
शायद उसे नव रुप
धरना पसंद है ।
विकास सिखा देता है
विषाणुओं जीवाणुओं को भी
अपने जैसा होना,
विषाणु भी नए रूप धर रहे
औषधियों को मात देकर
दौड़ में आगे निकल रहे
अपने धागों को उधेड़-बुन कर
रंग- रूप बदल रहे।
विकास दिखता है बीमारियों से लड़ते
अस्पतालों की आधुनिक मशीनों में,
संभवतः उसे कीमत लेकर
लड़ना पसंद है।

वित्त-अवित्त के एलगोरिदम में,
चित्त में उसके,
अटका हुआ वित्त है,
करूणा हर किसी के लिए
नहीं उपलब्ध।
असमर्थ स्तब्ध है
ज्ञानी भी स्तब्ध है
हवा-दवा के माफिक
जीवन की साँसे भी
कीमती दामों पर उपलब्ध हैं ,
फर्जी दिलासे के लिए
नकली रेमडेसिविर लब्ध है।
समर्थ भी नहीं कोई
कम दृब्ध है
कह रहा कोई
ये तो प्रारब्ध है,
कोई किसी के
वायदों से बहुत क्षुब्ध है।

विकास उग आता है कई बार
टेड़े मेढ़े आदिम विश्वासों में,
विकास रहने लगता है कई बार
सूने मन में,
जैसे वो सोख लेता है
अपने तन में
भरोसा भी, उम्मीद भी
समय और दूरी भी
जो बचा है-
खालीपन और विरोधाभास
वही दे रहे उसकी
मौजूदगी का आभास ।

घाल-मेल के हेर-फेर के
किस्सों में,
विकास दिख जाता है
कटते जंगलों के बाद
उगते शहरी हिस्सों में ।
शायद उसे हरे-भरे जीवन का
कट जाना ही पसंद है,
तितलियों के घुंघरू
जहाँ निष्पंद हैं।
विकल्पों के आधिक्य से हो भ्रमित
विकास अभी थक कर सो रहा है ,
कुम्भकर्णी नींद।
जैसे जगने की क्षीण है उम्मीद
चल रही क्योंकि विकट विपत्ति है
इसीलिए मृत देहों को नदियों में
बह जाने में भी,
उसे ना कोई आपत्ति है।
ले जायें बहा कर तो ले जायें
तेज चलती हवाएं,
या अपने आप मिट्टी में
मिल मुक्ति पा जायें,
वैसे मुक्त हो जाते है
मिलकर सब मिट्टी में
जलने के बाद उम्र भर
कामनाओं की भट्टी में !

सवालों के साथ
बहते बहते मृत देह
अपना फर्ज निभाती जा रहीं
सोये हुए को जगाने के लिए
जैसे आवाज़ लगा रही
बहुत सो लिए चलो भोर हुई
अब उठो विकास,
सुसुप्ति है मुक्ति
बोलो विकास …

डॉ.सुनील कुमार शर्मा

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