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की अपना देश है महान। जिसमें रहते सर्वधर्म इंसान। विश्व में अलग ही है पहचान। जिसे लोग कहते हिंदुस्तान। ये देश है बहुत महान।। जो नारी की लाज लूटते है। नहीं उनको देते है सम्मान। चाहे वो मुल्ला हो या… Read More
चाहकर भी मैं भूल, नहीं सकता तुम्हें। देख कर अनदेखा, कर सकता नही तुम्हें। दिलकी धड़कनों को, कम कर सकता नहीं। क्योंकि ये दिल है, जो मानता ही नही।। माना कि मुझ से, नफरत है तुम्हें। मेरी बातें से तुम्हें,… Read More
मंज़िलें पास नहीं होतीं, ज़रा दौड़ना सीखो सफर की रुकावटों को, ज़रा तोड़ना सीखो ज़िंदगी की राह में मिलते हैं अनेक चौराहे, यूं हौसले की गाड़ी को, ज़रा मोड़ना सीखो होती नहीं हर चीज़ हर किसी के मुकद्दर में, बाक़ी ख़ुदा की मर्ज़ी पे, ज़रा छोड़ना सीखो न मिलता कभी सुकून अपनों को भुला कर, उनसे टूटे हुए रिश्तों को, ज़रा जोड़ना सीखो चलते हैं जुबाँ के तीर हर तरफ से कितने ही, तुम बधिरता के कवच को, ज़रा ओढ़ना सीखो निशब्द होना भी तो ज़िंदगी पे बोझ है ‘मिश्र’, जिगर में भरे ज़हर को, ज़रा निचोड़ना सीखो 00
कल की फ़िक्र में, आज का बिगाड़ मत करिये मरने से पहले ही, कफ़न का जुगाड़ मत करिये भला कल तक रहेगा कौन ये किस को पता है, यूं हाथों में आईं, ख़ुशियों का कबाड़ मत करिये अपने ख्वाबों को झूठी उड़ान मत दो तो बेहतर, सच तो सच ही रहेगा, राई का पहाड़ मत करिये मिलती है मुश्किलों से अपनों की मोहब्बत यारा, रखिये ज़रा संभाल के, इसका दोफाड़ मत करिये चमन में तो गुल खिलेंगे अपने ही वक़्त पे “मिश्र”, पर जल्दी की चाहत में, इसका उजाड़ मत करिये +10
आचार्यश्री के 53वे दीक्षा दिवस पर संजय जैन द्वारा रचित भजन उनके चरणों मे समर्पित है। जो चलते हो नंगे पाँव, जगत कल्याण के लिए। एक बार तो जय कारा लगाओ, विद्यासागर मुनिराज के लिए।। गांव गांव में जाकर, जैन… Read More
गुजर गए इतने दिन, तो बाकी भी निकल जाएंगे। घर में रहना क्या होता, समझ में आ गया होगा। कैसे दिनभर घर में कोई, अकेला रह सकता है। यही काम तो तुम्हारी, धर्मपत्नी अकेले करती है। और घर के काम… Read More