baagh kedarnath singh

केदारनाथ सिंह हिंदी कविता की मुख्यधारा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक थे। ‘बाघ’ उनके द्वारा रचित एक लम्बी कविता-श्रृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े 21 खंड है। ‘बाघ’ कविता दो काल खंडों में लिखी गयी है, इसके पहले रचना-खंड में 16 छोटे-बड़े  काव्यखंड हैं, जबकि दूसरे  काल खंड में 5 काव्यखंड और जोड़ दिए गए हैं। इस के संबंध में केदार जी लिखते हैं “पहली बार जब बाघ का बिंब मेरे मन में कौंधा था, तब यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं था कि वह एक लंबी काव्य-श्रृंखला का बीज-बिंब बन सकता है। वस्तुतः पहले टुकड़े के लिखे जाने के बाद ही यह पहली बार लगा कि इस क्रम को और आगे बढ़ाया जा सकता है। फिर तो एक खंड के किसी आंतरिक दवाब से दूसरा खंड जैसे अपने-आप बनता गया।”
केदार जी को बाघ लिखने की प्ररेणा हंगरी भाषा के कवि यानोश पिलिंस्की की एक कविता पढ़ने से मिली। उस कविता में कवि को अभिव्यक्ति की एक नई संभावना दिखी थी।  वह कविता ‘पशुलोक’ से संबंधित थी और ‘पशुलोक’ से संबंधित होने के कारण ही कवि का ध्यान पंचतंत्र की ओर जाता है, क्योंकि उसमें ‘पशुलोक’ का एक बहुत पुराना और आत्मीय रूप पहले से ही मौजूद है। आशय यह है कि लेखक का पंचतंत्र की दुनिया में प्रवेश नई संभावना के अभिव्यक्ति की तलाश के लिए ही है। केदारनाथ सिंह पंचतंत्रीय बाघ का सीधे-सीधे अनुकरण नहीं करते और उनका कहना है कि वह अनुकरण कर भी नहीं सकते क्योंकि-“पंचतंत्र की संरचना की अपनी कुछ ऐसी खूबियाँ हैं, जो सतह पर जितनी सरल दिखती हैं, वस्तुतः वे उतनी सरल हैं नहीं।”

लेखक के शब्दों में, “पंचतंत्र एक इसी कृति है जो एक समकालीन रचनाकार के लिए जितनी चाहे बड़ी चुनौती हो, पर ज़रा-सा रुककर सोचने पर वह सृजनात्मक संभावना की बहुत-सी नई और लगभग अनुद्घाटित पर्तें खोलती-सी जान पड़ेगी।”3  इस प्रकार केदार जी द्वारा ‘बाघ’ कविता का जन्म हुआ था लगभग एक छोटे शिशु की क्रीड़ा की तरह आड़ी-तिरछी  रेखाओं से, जिन्हें  पुस्तक में भी चित्रित किया गया है।

‘बाघ’ कविता के जन्म में समकालीन परिस्थितियों के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता।“ सन् 1962  में चीन का आक्रमण, संविद सरकारों का गठन, आपातकाल, उसके पश्चात् जनता का सत्तारूढ़ होना, यह सब ऐसी घटनाएं हैं जिसने राजनीति के साथ हमारे सांस्कृतिक संस्कारों को भी प्रभावित किया है। केदार सिंह की इस बीच लिखी गई कविताओं को पढ़ते हुए हम उस समय की धड़कनों को सुन सकते हैं।”4   लगभग 23 वर्ष बाद ‘बाघ’ कविता का प्रकाशन होना इस ओर संकेत करता है कि अगर इस बीच उन्होंने कविता नहीं भी लिखी  हो , पर वह चुप नहीं थे। बाघ कविता का पहला पुस्तक राजकमल प्रकाशन  समय 1985 था, प्रतिनिधि कविताएँ के नाम से। यदि इस कविता को पढ़ते हुए 1985 की राजनीतिक विसंगतियों को ध्यान में रखकर पढ़ा जाए तभी इस कविता की व्यापकता को समझा जा सकता है।

हर कवि अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए नयी-नयी कोशिशें करता है। यह कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर हो सकती  हैं। ‘बाघ’ श्रृंखला के हर खंड में एक नए रूप में सामने आता है, और लगभग हर बार वह अपने बाघपन के एक नए अनुषंग के साथ दिखता है। कविता के दूसरे खंड में जिस बाघ का बर्णन आता है वह इस प्रकार है-

“सच्चाई यह है कि हम शक नहीं कर सकते
बाघ के आने पर
मौसम जैसा है
और हवा जैसी बह रही है
उसमें कभी भी और कहीं भी
आ सकता है बाघ।

‘बाघ’ कविता को पढ़ते समय मन में यही विचार आता है कि आख़िर यह बाघ कौन सा बाघ है? क्या यह वही बाघ है, जिसकी कहानियाँ हम बचपन में अपनी दादी-नानी से सुनते आए हैं, जिसे हिंसक जानवर बता कर हमे डराया जाता था। या फिर यह वह बाघ है जिसे हमने टी०वी० या किताबों में देखा है? या फिर बच्चों के खिलौने के रूप में बाघ? कविता को पूरा पढ़ने के बाद हमें ‘बाघ’ कविता में उसके जितने भी चित्रनज़र आते हैं उनमें वह ज्यादातर अहिंसक, मानवीय जिज्ञासा और उत्सुकता से युक्त, सदैव प्रश्न करता हुआ ही चित्रित हुआ है।प्रेम का रूप भी है और जादू का भी। लेखक की यही विशेषता इस कविता को और अधिक विशिष्ट बना देती है। कविता में बाघ लोगों के ‘चुप’ हो जाने से हैरान है कि आख़िर लोग इतने चुप क्यों हैं?-

“इतने चुप क्यों रहते हैं आजकल?’
एक दिन बाघ ने लोमड़ी से पूछा
लोमड़ी के समझ में कुछ नहीं आया
फिर कुछ देर बाद कुछ सोचते हुए बोली-
कोई दुःख होगा उन्हें।”

इसी लोमड़ी को कवि ने खंड नौं में बाघ के प्रतिपक्ष के रूप में दिखाया है और कविता बाघपन और लोमड़पन के अंतर्विरोध की कविता बन जाती है।

‘बाघ’ कविता के माध्यम से लेखक ने उस समय के कुरूप यथार्थ को समाज के सामने रखने का प्रयास किया है, जिसने आज आधुनिक युग में भयानक रूप धारण कर लिया है और इसके चपेट से महानगर, नगर क्या बस्ती भी नहीं बच पायी है। लोग शहरों की चमचमाती रोशनी की ओर खींचे जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इससे पहले लोग शहर नहीं गए है, पर अगर ऐसा ही चलता रहा तो बस्ती एक दिन उजड़ जाएगी।  यही डर उस बाघ को सता रहा है, तेरहवें खंड की यह पंक्तियाँ बाघ के इसी डर को उजागर करती हैं-

“वह उन्हें पहले भी देख चुका था कई बार
वे हमेशा इसी तरह जाती थीं
बस्ती से शहर की ओर
कुछ-न कुछ ढोती हुई
और अपने हिस्से की ज़मीन
लगातार-लगातार खोती हुई बैलगाड़ियाँ।”

जब बस्ती ही उजड़ जाए तो न वहाँ लोगों के घरों से उठता धुआँ  नज़र आएगा  और न ही कोई शोर-शराबा। जैसे कि पूरी की  पूरी बस्ती गहरी नींद में सो गयी हो। चौदहवें खंड की निम्न पंक्तियाँ इसी सन्नाटे को चित्रित करती हैं –

“उसे पता था
की जिधर से भी उठता है धुआँ
उधर होती है बस्ती
उधर रँभाती है गायें
उधर होते हैं गरम-गरम घर
उधर से आती है आदमी के होने की गंध
आज पहली बार
उसे धुआँ के न उठने से
बस्ती के न होने का शक हो रहा था।”

पूँजीवादी भौतिक विकास से जहाँ एक ओर मनुष्य तरक्की कर रहा है, वहीं दूसरी ओर यह विकास उसका बहुत कुछ  छीन भी रहा है और यदि यह क्रम ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन मूल मानव चरित्र  खत्म होने के कगार तक पहुँच जाएगा। आए दिन हम अखबारों में पढ़ते है कि जंगलों को नष्ट करने के कारण उसमें रहने वाले जानवरों की संख्या भी लगातार कम होने लगी है। लेखक को डर है कि यदि ऐसा ही रहा तो, एक दिन ऐसा भी आएगा जब जो गिने-चुने बाघ रह गए हैं, उनका भी अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। उसके बावजूद भी मनुष्य अपने स्वार्थ से पीछे नहीं हटता और यह भूल जाता है कि एक दिन वह ख़ुद भी इसकी चपेट में आने से नहीं बच सकता और यदि मनुष्य ही नहीं रहेंगे तो ‘बाघ’ को किताबों में पढ़ने वाले आँखें भी नहीं रहेंगी, जब पढ़ने वाले ही नहीं रहेंगे तो उसे छापेगा ही कौन? जब जंगल ही नहीं रहेंगे तो तब पेड़ भी नहीं बच पाएँगे और जब पेड़ ही नहीं रहेंगे तो लिखने के लिए कागज़ भी नहीं होगा। अठारहवें खंड की यह पंक्तियाँ इसी विनाश से हमें रू-ब-रू कराती है-

“उन्हें डर है कि एक दिन
नष्ट हो जाएँगे सारे-के सारे बाघ
बाघ से भी ज़्यादा चमकता हुआ डर
कि हाथ कहाँ होंगे
आँखें कहाँ होंगी जो पढ़ेगी किताबें
प्रेस कहाँ होंगे जो उन्हें छपेंगे
पन्ना कहाँ होगा जिस पर ‘क’ के बाद
कहीं से उछलता-कूदता
आ जाएगा ‘ल’ या श।”

केदारनाथ सिंह भूमंडलीयकरण के दुष्परिणामों से भली-भाँति परिचित थे और उन्होंने इसे अपनी ‘बाघ’ कविता में भी चित्रित किया है। वे जानते थे कि आज जो मनुष्य विकास की तरफ़ भाग रहा है, एक दिन वह भागता-भगता इतना थक जाएगा कि दुबारा वापिस लौटना चाहेगा, पर चाह कर भी वह पीछे छोड़ी हुई चीजों को वापिस नहीं पा सकेगा और यह उसके दुःख का कारण भी बनेगा। ‘बाघ’ कविता में लेखक ने बाघ और लोमड़ी दोनों को दोस्तों की तरह लोगों के दुःख के बारे में बातें करते चित्रित किया है-

“हो सकता है
उन्हें कोई काँटा गड़ा हो! बाघ ने पूछा
‘हो सकता है
पर हो सकता है आदमी ही
गड़ गया हो काँटे को।”

मनुष्य जब बस्ती छोड़ शहर की ओर जाता है, तब वह अपने पीछे बहुत कुछ गवाँ कर जाता है। इस कविता में शहर के बारे में बाघ के विचार अच्छे नहीं हैं। इसलिए तो जब वह पहली बार शहर जाता है तो शहर के लिए गहरा तिरस्कार और घृणा उसमें उत्पन्न होती है और वह वहां से चला जाता है। दूसरे खंड में प्रस्तुत यह पंक्तियाँ इसी बात को उज़ागर करती है-

यह कितना अजीब है
कि वह आया
उसने पूरे शहर को
एक गहरे तिरस्कार
और घृणा से देखा
और जो चीज़ जहाँ थी
उसे वहीं छोड़कर
चुप और विरक्त
चला गया बाहर।”

केदारनाथ सिंह द्वारा रचित ‘बाघ’ कविता पर अपनी बात रखने से पहले पशु-जगत् पर लिखे गए, उनके  अन्य काव्य पर भी ध्यान देना जरूरी है। ‘बैल’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-

वह एक ऐसा जानवर है जो दिनभर
भूसे के बारे में सोचता है
रात भर
ईश्वर के बारे में।
इसी प्रकार, बाघ कविता में जब बाघ का सामना बुद्ध से होता है, वहाँ वे कह रहे  हैं- “जहाँ एक ओर भूख ही भूख थी
दूसरी ओर करुणा ही करुणा।”

लेखक के लिए बाघ ‘भूख ही भूख है’।

इन पंक्तियों से पता चलता है कि केदारनाथ सिंह का व्यवहार पशु-जगत् के लिए कोमल और करुणा से भरा हुआ है। उनकी कविता में पशु अपनी ‘प्राकृतिक सत्ता’ नहीं खोते। उनका चाहे वह बिम्ब, प्रतीक, मिथक के रूप में प्रयोग करें, पर उनका प्राकृतिक अस्तित्व जगत् में पहले से ही है, जिसे ठुकराया नहीं जा सकता।

‘बाघ’ के संबंध में लेखक के शब्द- “बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह एक प्राकतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है।”

पंचतंत्र की आधार शैली से हल्का-सा लाभ उठाने की कोशिश करती यह कविता आधुनिक जीवन और समय की जटिल वास्तविकता को अत्यंत अर्थ सघन रूप में प्रस्तुत करती है। इस ढलती हुई शताब्दी को उठाने की कोशिश करती यह कविता आधुनिक जीवन और समय की जटिल सौन्दर्य और आंतक को एक ही बिंदु पर जीने और महसूस करने के लम्बे प्रयत्न के रूप  में घटित होती है।”14 कविता के उन्नीसवें खंड की यह पंक्तियाँ-

“जीना होगा
रस्सी से झूलक
वधस्थल से लौटकर
जीना होगा
समय
चाहे जितना कम हो
स्थान
चाहे उस से भी कम
चाहे शहर में बची हो
बस उतनी-सी हवा
जितनी एक साइकिल में होती है
पर जीना होगा।”

कवि का यह सकारात्मक दृष्टिकोण कविता में जगह-जगह पसरा है। यहाँ तक कि खंड उन्नीस में कवि कहता है कि ज़रूरत पड़ी तो बाघ के बिना भी जीवित रहा जाएगा।

“जीना होगा बाघ के साथ
और बाघ के बिना भी जीना होगा।”(पृष्ठ-54)

मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए शहर और बाज़ार तो बसा लिया, पर विडंबना तो देखो आज वही शहर मनुष्य के लिए रहने लायक ही नहीं रहा और धीरे-धीरे वहाँ की सारी-चीज़े भी नष्ट होने के कगार पर हैं। लेखक ने अपनी कविता में निरंतर लुप्त होती, उन चीजों को बचा लेने की बात कही है और साथ ही मनुष्य को हर हाल में जीने का संदेश भी दिया है-

“जीना होगा और यहीं, यहीं
इसी शहर में जीना होगा
चप्पा-चप्पा जीना होगा
और जैसे भी हो
यहाँ से वहाँ तक
समूचा जीना होगा।”

केदारनाथ की कविताओं की भूमि नगर-कस्बों से लेकर गाँव तक की है। उनका जुड़ाव लोक-जीवन और सभ्यता के प्रति गहरा दिखता है। उनकी कविताओं के माध्यम से हम हिंदी को एक नए रूप और अर्थ में भी देख सकते हैं। केदारनाथ अपनी कविताओं में बिम्ब का अत्यधिक प्रयोग करते थे, तभी तो ‘बाघ’ कविता की शुरुआत पंक्तियाँ कुछ इस तरह शुरू होती हैं-

“बिंब नहीं
प्रतीक नहीं
तार नहीं
हरकारा नहीं
मैं ही कहूँगा।”

इस प्रकार केदार जी यह ताक़ीद करते हैं की उनकी कविता को उनके एक बयान के रूप में देखा जाए न कि केवल काव्य उपकरण के रूप में। बिंब या प्रतीक रूप में। इस प्रकार इस कविता के द्वारा अपने ही प्रति बनी पूर्व धारणा को भी तोड़ना चाहते हैं।

केदारनाथ सिंह ‘तीसरा सप्तक’ में अपने वक्तव्य में कहते हैं-“मैं बिम्ब-निर्माण की प्रक्रिया पर ज़ोर इसलिए दे रहा हूँ कि आज काव्य के मुल्यांकन का प्रतिमान लगभग वही मान लिया गया है। एक अग्रज़ आलोचक का तो यहां तक कहना है कि आधुनिक कवि नये-नये बिम्बों की योजना के द्वारा ही अपनी नागरिकता का शुल्क अदा करता है। तात्पर्य यह है कि प्राचीन काव्य में जो स्थान ‘चरित्र’ का था, आज की कविता में वही स्थान बिम्ब अथवा ‘इमेज’ का है।”

हरप्रसाद दास लिखते हैं कि-“इस ढलती शताब्दी के इस अंधे मोड़ पर ‘बाघ’ दरअसल समय के विध्वंसों के ख़िलाफ़ मनुष्य के संघर्ष की लोकगाथा है। कई बार लगता है कि वस्तुतः यह मायावी समय ही बाघ है।” उन्नीसवें खंड की यह पंक्तियाँ मनुष्य की इसी संघर्ष गाथा व्यक्त करती हैं-

“जब सूरज डूब रहा था
एक आदमी खड़ा था शहर की सब से ऊँची मीनार पर
और चिल्ला रहा था-
दोस्तों, यह सदी बीत रही है
बीत रहे हैं सारे पहाड़ और नदियाँ
और हाबड़ा का पुल
और हवाई जहाज़ के डैने
और बुनते हुए हाथ
और चलते हुए पैर।”

पोलिश कवयित्री विस्साव शिम्बोर्स्का भी बीती हुए सदी के संबंध में लिखती है-

“आखिरकार हमारी सदी बीत चली है
इसे दूसरी सदियों से बेहतर होना था
लेकिन अब तो
यह अपने गिने-चुने साल पूरे कर रही है
इसकी कमर झुक गई ह
सांस फूल रही है….
कितनी ही चीज़ें थीं
जिन्हें इस सदी में होना था
पर नहीं हुई
और जिन्हें नहीं होना था
हो गयी।”

बीती सदी पर आधारित दोनों कविताओं में संवेदना और बिंबों के माध्यम से समय की जो तस्वीर केदारनाथ सिंह पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं, वह साक्षात दिखाई देते है और उसका अपना अलग ही महत्त्व है।

कविता में एक जगह बाघ ‘निरंतर वर्तमान से ऊब कर’ उस वर्तमान से जहाँ वह एक तरह से ‘दिन-रात रहने और गुर्राने के’ अलावा उसके पास ओर कोई काम ही नहीं है, खरगोश को अपने पास बुलाता है और उसकी देह पर उभरे मुलायम और सफेद रोओं को छूकर उसे लगता है कि ‘यह एक नई बात है।’ ‘बाघ’ के लिए यह अनुभव सुखमय है। बाघ का निरंतर वर्तमान से ऊब जाना वास्तव में  स्वयं कवि का ही कविता की प्रचलित रुढियों से ऊब जाना है और पंचतंत्रीय लोक में पहुँचकर ‘बाघ’ जो बाघ के रूप में स्वयं कवि ही है, उन्हें लगता है कि ‘यह एक नयी बात है और उनका यह विश्वास भी है-

“पहाड़ का मस्तक फाड़कर
लाया जा सकता है नदी को
समूचा उठाकर
ठीक अपने जबड़ों की प्यास के क़रीब।”

पंक्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि यह स्वयं कवि का ही विश्वास है और जिस नदी की इसमें बात की जा रही है, वह कोई सामान्य नदी नहीं है बल्कि अर्थ रूपी नदी है। कवि कविता के अंतिम खंड में बाघ के व्याकरण विरोधी अर्थात व्यवस्था विरोधी रूप को कुछ इस तरह प्रस्तुत करता है-

“वैयाकरण ऋषि के लिए
यह एक बिलकुल नई समस्या थी
क्योंकि उनकी स्मृति में जितने भी सूत्र थे
उनमें से किसी में वह आवाज़
अँटती ही नहीं थी।”

इन्हीं पंक्तियों को लेखक की सबसे बड़ी प्रेरणा कहा जा सकता है। कवि व्याकरण की शुद्धता में बाघ की अशुद्ध आवाज़ को शामिल करने के पक्ष के साथ कविता को असमाप्त छोड़ देता है।

इस प्रकार यह कविता जितना हमारे समय का उद्धाटन है, उतना ही कवि का भी। कविता का बाघ हम सब हैं, जिनमें कवि ख़ुद शामिल है। संभवतया यह कवि की श्रेष्ठम कविता है अपने नए, व्यापक और युगधर्मी कलेवर के कारण। पर यह भी हो सकता है कि यह हिंदी की सर्वकालिक उपलब्धिपूर्ण लम्बी कविताओं में से एक है।

संदर्भ सूची :

  1. सिंह, केदारनाथ, ‘बाघ’, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1998, पृष्ठ संख्या-5
  2. यथावत्, पृष्ठ संख्या-5
  3. यथावत्, पृष्ठ संख्या-5
  4. यायावर, भारत, खुगशाल, रजा, ‘कवि केदार नाथ सिंह’, दिल्ली, वाणी प्रकाशन, 2004, पृष्ठ संख्या-53
  5. सिंह, केदारनाथ, ‘बाघ’, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1998, पृष्ठ संख्या-11
  6. यथावत्, पृष्ठ संख्या-22
  7. यथावत्, पृष्ठ संख्या-41
  8. यथावत्, पृष्ठ संख्या-43
  9. यथावत्, पृष्ठ संख्या-51
  10. यथावत्, पृष्ठ संख्या-22
  11. यथावत्, पृष्ठ संख्या-13
  12. यथावत्, पृष्ठ संख्या-19
  13. यथावत्, पृष्ठ संख्या-5
  14. यायावर, भारत, खुगशाल, रजा, ‘कवि केदार नाथ सिंह’, वाणी प्रकाशन, 2004 पृष्ठ संख्या-117
  15. सिंह, केदारनाथ, ‘बाघ’, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ, दूसरा संस्करण,1998, पृष्ठ संख्या-54
  16. यथावत्, पृष्ठ संख्या-55
  17. यथावत्, पृष्ठ संख्या-9
  18. यायावर, भारत, खुगशाल, रजा, ‘कवि केदार नाथ सिंह’, वाणी प्रकाशन, 2004, पृष्ठ संख्या-36
  19. सिंह, केदारनाथ, ‘बाघ’, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दूसरा संस्करण,1998, पृष्ठ संख्या,63
  20. यथावत्, पृष्ठ संख्या-54
  21. http://google.co.in/amp/s/hindi.firstpost.com/amp/special/remembering-hindi-poet-kedarnath-singh-and-his-poetry-and-poem-bagh-pr-98087.html , 23/11/2018
  22. सिंह, केदारनाथ, ‘बाघ’, नयी दिल्ली, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दूसरा संस्करण, 1998, पृष्ठ संख्या-35

11 thoughts on “शोध लेख : समकालीन मनुष्य और उसकी सभ्यता का अंदरूनी बाघ”

  1. इस शोध लेख के माध्यम से केदारनाथ सिंह द्वारा रचित “बाघ” कविता के अनछुए पहलुओं को नए रूप में जानने का मौका मिला है। बहुत बहुत बधाई।

  2. अति उत्कृष्ट शोध लेख। बहुत बहुत शुभकामनाएं।

  3. इस अति उत्कृष्ट शोध लेख के लिए आपको साधुवाद इस शोध लेख के माध्यम से केदारनाथ द्वारा रचित कविता बाघ के माध्यम से बाघ के अनछुए पहलुओं को समझने का सौभाग्य हमे मिला।

  4. बहुत ही अच्छा लेख और एक सार्थक प्रयास बहुत खूब सपना।

  5. बहुत ही सुन्दर शब्दों में आपने ये लेख लिखा है ।

  6. उत्कृष्ट लेख लिखने के लिए आप बधाई की हकदार हैं और धन्यवाद आपके लेख के माध्यम से बाघ जैसी सार्थक रचना को पढ़ने व प्रतीकात्मक रूप से ग्रहण करने का अवसर मिला । उपर्युक्त शोध में यथार्थ समय की कुरूपता को प्रतीक रूप में प्रयुक्त बाघ के द्वारा अत्यंत नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है ।

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