yatri

जीते-जागते निकल जाता हूँ
द्वन्द्व के दुर्गम मार्ग को,
युद्ध होता है
विचारों के विशाल अवनि पर
जीत है, हार है
स्वीकार है, तिरस्कार है
निंदा-स्तुति है,
मान-अपमान है
मानव के इस जग में,
अंतरंग के संगम क्षेत्र में
समेटकर चलता हूँ
ज्ञान-विज्ञान की रोशनी में
अपने आपको निहारता हूँ
सत्य नहीं भव-बंधन यहाँ
भौतिक जग के नियम सभी
सुख-भोग की लालसा में एक झूठ है
नहीं भेद,नहीं व्यवधान
परिवर्तन सत्य है
वर्ण-जाति,धर्म-संप्रदाय
स्वार्थ मनुष्य की उपज है
सबको तोड़कर एक दिन अवश्य
हरेक को चलना पड़ता है
समता की भूमि में
शाश्वत सत्य का स्वीकार होता है।

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