suraj

जमाना कब रहा किसका जमाना रहेगा किसका
जमानेके इशारे से जो अपना हर कदम बढ़ाओगे
मानो बात या न मानो मगर तुम फिसल जाओगे
जमाना कब रहा किसका जमाना रहेगा किसका
तुम्हारी रफ्तार से पीछे रहता है तो ये खीझता है
तुम्हें पीछे जो कर देता है तो ये औकात पूंछता है
मेरी सांस और धड़कन रही, अपने ही इशारों पर
बुलंदी मिल रहीहै और मिलेगी अपनी मेहनत पर
जमाना किसी की किस्मत का सितारा कब बना है
आदमी अपनों की चाहत अपनी मेहनत से बना है
जो चाहत अपनों की हो, सच्ची मेहनत अपनी हो
जमाना कब किसे यहां पर बढ़ने से रोक पाया है
जमाने की बात ही है क्या हारा है खुदा मेहनत से
मजबूर होकर बंदे के सामने खुद चलकर आया है
माना हार भी होती कभी मंजिल के सफर में मंजर
जीता है वही संघर्ष मेंजो मिटने मिटाने पर आया है
ये जिद ही है जिसने गंगा मां को पृथ्वी पर लाया है
इंसान ने अंतरिक्ष में अपना बुलंद परचम लहराया है
दुर्गम महापर्वत को काटकर अपना रास्ता बनाया है
याद वे ही रहे हैं रहेंगे अरबों में, कुछ हजार ही यहां
जिन्होंने आसमां और पर्वत को पैरों के नीचे लाया है
अथाह समुद्र में जाकर निडर होकर गोते लगाया है
अपना किरदार यहां पर पूरी ईमानदारी से निभाया है
अपने संकल्प व स्वप्न से धरती मां को स्वर्ग बनाया है
बाकि करोड़ों अरबों इंसान यूं ही आते व जाते रहेंगे
जिसे महान बनाना है उसे समय ने खूब आजमाया है
उठा जितनी बार जिद से उतनी बार उसको गिराया है
मगर गिर उठ- उठ गिरकर ही वो महान बन पाया है
तारे तो अरबों करोड़ों थे है रहेंगे इस जहां में ऐ!मंजर
पर अन्धेरा छांटने की जिद ने हमको सूरज बनाया है

One thought on “कविता : जिद ने हमको सूरज बनाया है”

  1. बहुत ही अच्छा सृजन करते है रचित जी, आशा है भविष्य में भी इसी तरह की रचनाएँ पढ़ने को मिलेंगी.

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