बहुत सारे लोगों की ये शिकायत रहती है कि गरीब मजदूर लोग अपने गांव मे ही क्यों नही मजदूरी करते, बाहर क्यों चले जाते हैं? इस विषय पर आगे बढ़ने के पहले कल के अखबार का संज्ञान लेना चाहूँगा। अभी हाल ही मे गोंडा जिले की एक घटना अखबार मे छपी थी जिसमें लखनऊ विश्वविद्यालय मे छात्रनेता रहे विजय कुमार सिंह उर्फ़ टिन्टू सिंह, उनके भाई लाठी सिंह व एक उनके सहयोगी कन्हैया पाठक को गोली मार दी गयी। विजय सिंह हास्पिटल मे हैं और बाकी दो लोगों का शव अन्त्येष्टि के लिये तैयार किया जा रहा है। मामला बहुत ही सामान्य सा है। सरकारी अधिकारियो को शिकायत मिली थी कि उमरीबेगमगन्ज के परास गांव मे मनरेगा की मजदूरी बाँटी जा रही है जिसमे मजदूरो को एक हजार रुपयो के बजाय दो सौ रुपये पकड़ाये जा रहे हैं। सरकारी अधिकारी रास्ता भटक गये थे जिन्हे विजय सिंह ने सही जगह पहुंचा दिया। ग्रामप्रधान व उनके गुर्गो को लगा कि ये सब विजय सिंह की ही करतूत है, फ़िर क्या दनादन फ़ायरिन्ग चालू। कुछ फ़िल्मी सा नही लगता? यही सब तो पुरानी फ़िल्मो मे दिखाया जाता था वो अलग बात है कि आदमी का टेस्ट अब बदल गया है और वो उत्पीडन, शोषण व गैरबराबरी की घटनाओ पर आधारित फ़िल्मे अब नही देखता।

* दो प्रभावशालियो के बीच मे घटी इस घटना का सबंध किसी पुरानी रंजिश का कारण भी हो सकता है। लेकिन मेरी पड़ताल देश के उन लाखों गांवो व हजारो शहरो की है जिनमे सामन्तवाद की जड़े बहुत गहरे मे समायी हुई है। कभी प्रकट रुप मे तो कभी अप्रकट रुप मे। गोंडा वाली घटना का एक सबक यह भी है कि भले ही आप अपरकास्ट जाति से हैं यदि आप गरीब मजलुमो के हक मे खड़े हैं तो आपके साथ वही सामन्ती सलूक किया जायेगा जो सबल निर्बल पर करता आया है।

* ये सिर्फ़ एक जिले विशेष की घटना नही है।ये हर उस गांव या कस्बे की घटना है जहां पर उत्पीडन व शोषण की रिपोर्टिंग नही होती। ये तो कहिये कि गोण्डा की इस घटना को प्रशासन ने हर तरीके से संग्यान लिया वरना कई घटनाओ का संग्यान लेना तो दूर, हमारे चिंता का कारण भी नही बनते। और सबकुछ ‘अच्छा है’ वाले भाव से हम स्वीकार करते रहते हैं।

* इस संबंध मे गाँधी के सपनो का भारत अर्थात ‘रामराज्य’ बनाम ‘डा. अम्बेडकर की आशंका’ की बहस रुप मे आज भी मौजूद है।

* गांधीजी का मानना था कि स्वर्ग भारत के गाँवो मे ही बसता है। बेशक गाँधीजी के नेकनीयति पर कोई संदेह नही कर सकता। मगर व्यक्ति का अपने और अपने समाज के प्रति अपनाया हुआ खुद का आदर्श, दूसरे वैसे ही नही अपनाते या मानते। ग्राम पंचायतो व ग्राम समाज के बारे मे गांधीजी की जो सोच थी वो किन्ही स्वर्ग को धरातल पर उतारने सरीखा था। एक गांव मे सब लोग  आपस मे प्रेम भाईचारे से रहें, आपसी मामले मिल बैठ कर सुलझाये, थाना पुलिस कचहरी से दूर रहें,खाड्यान आत्मनिर्भरता, गांव नैतिक आदर्शो का समुंद्र बने… इत्यादि सब गाँधीजी द्वारा स्थापित किये जाने योग्य आदर्श थे। क्या ये संभव हैं? लोग तुरंत उदाहरण गिनाने लगते हैं। अन्ना हजारे को देखिये उन्होने अपने गांव को स्वर्ग बना दिया है। (हालांकि जिनको हजारे के बारे मे पता है कि वो कितने जातिवादी व दकियानूस इंसान है) फ़लाना गाँव देखिये। ढमाका गाँव देखिये!

*यही पर डॉ. अम्बेडकर प्रासंगिक हो उठते हैं जब वो कहते हैं कि गाँव सामंती उत्पीडन के केन्द्र हैं। संविधान सभा की बहस मे उन्होने गाँवो को अधिक स्वायतता देने पर कुछ वाजिब सवाल उठाया। गांव मे तो लोग अबर और जबर मे बंटे होते हैं। अबर का फ़ैसला जबर के हाथों मे कैसे सौंपा जा सकता है? वैसे भी भारत का ग्रामीण समाज ‘जाति आधारित’ समाज है। यहाँ गरीब ब्राहम्न अमीर जाटव से ज्यादा सामाजिक हैसियत रखता है। ये कैसे संभव होगा कि ऐसे समाज मे ‘पंच परमेश्वर’ सही फ़ैसला सुनायेगे?

इसलिए डा।अम्बेडकर ने केन्द्रिय कानूनो को मजबूत करने पर जोर दिया जिनकी बुनियाद गरीब मजलुमो के प्रति संरक्षणवादी तथा सभी अवामो के लिये सेकुलर है बजाय स्थानीय व्यवस्थाओ के जहाँ सामाजिक मूल्यो के प्रति यथास्थिवादी व पुरातन सोच रखती है। यह तो सिर्फ़ किसी चिडियाघर के प्रशिक्षित जानवरो के साथ ही हो सकता है जहां एक हिरन व एक शेर एक हौदे मे एक साथ पानी पिये। गांव के तालाब मे ये संभव नही जहा आदमी, आदमी की परछाई से दूर भागता हो।

*कम मजदूरी देना, समय पर न देना, पूरा न देना, कोई भी आरोप लगाकर पैसे काट लेना, बंधुआ मजदूरी, मजदूर की खस्ता हालात का बेजा फ़ायदा उठाना, इत्यादि कभी खुलेआम होता था। आज इसका रुप बदल सा गया है। कहीं कहीं बाते संज्ञान मे आती हैं तो कहीं कहीं बिल्कुल नहीं। निश्चित ही सरकारी कानून मजदूर का उसका शोषण होने से बचाते हैं मगर उन मजदूरो का क्या जिनके पूरे परिवार पर सामन्त का ‘अज्ञात खतरा’ मंडराता हो और वो इसकी रिपोर्टिंग करने से हिचकता हो!

*पीडित व्यक्ति अपने घाव लेकर शहर मे आता है। शहर की प्रदूषित आबोहवा उसके घाव को जल्दी ठीक नही होने देती। लेकिन बेहतर काम के अवसर, पर्याप्त मजदूरी और इस मजदूरी से प्राप्त आय का अपने पोषण मे इस्तेमाल करना, उसे शकून देता है। धीरे धीरे वो अपने आसपास की दुनिया मे जब घुल मिलता है तो उसकी वो चिंताये निर्मूल हो जाती है जिन्हे वो अपने गांव से लाया होता है। मसलन छुआछूत व उसके पहचान पर आधारित चिंताए। लेकिन उसे नही पता होता है कि जिस बियाबान से वो निकलकर शहर को आया है उसी लोक के सामाजिक ‘दबंग’ भी तो पहले से ही शहर के रहनुमा बने बैठे हैं!

*जाति सूंघते रहता हमारा समाज तबतक चैन से नही बैठता जबतक कि वो इस ‘आदमी’ की सही पहचान नही कर लेता।

*शहर हो या गाँव अपर कास्ट हिन्दू या मुसलमान की मस्तिष्क की एक डिफ़ॉल्ट सेटिंग होती है। वो तब तक निश्चिंत नही होता जबतक कि उसे पक्का भरोसा न हो जाये कि ‘वर्मा’ मे कौन ‘वर्मा’? या कि कौन शर्मा? बढ़ई वाला तो नही? नउआ तो नही?

*अपर कास्ट परिवारो को जाति भेद मुक्ति की लड़ाई से दूर रखा गया है। इनके बीच मे जागरूकता फ़ैलाने की जरूरत है। क्योंकि यही तबका प्रोफ़ेसनल है, एकेडमिशियन है, पत्रकार है, वकील है और जज भी। मुकदमा यही करता है और फ़ैसला भी करता है। यह हमारी और आपकी ओपिनियन बनाता है। यह जो सोचता है,उसे ही यह राष्ट्रीय कहता है। उसे ही ये ज़रूरी बताता है। इसके कान्फ़्रेस व सेमिनार के मुख्य वक्ता, अतिथि व अध्यक्ष के सरनेम सेम होते हैं। लेखक भी यही है और समालोचक भी। ये जिन्हे चाहे उन्हे राष्ट्रीय कवि घोषित कर दे और जिन्हे चाहे राष्ट्रपुरुष। सबसे बड़ी समस्या ये है कि पुरस्कार वितरण वक्त इसे कुछ भी अटपटा नही लगता जबकि समाज के बाकी हिस्से को इस पुरस्कार से सर्वथा वंचित रखा जाता है।

*इस डिफ़ॉल्ट सेटिंग को ठीक करने का कोई प्रोजेक्ट फ़िलहाल नही चल रहा। क्योंकि आपने इसे बदलने की कोशिश की तो आप किसी खास खाँचे मे सिमटा दिये जायेगे। यहाँ आपके सरनेम से तय होगा कि आप चिंतक हैं कि दलित-चिंतक। यहाँ आपके सरनेम से तय होगा कि आप नेता हैं कि दलित/ओबीसी नेता।

*कोई सार्वभौम सलाह कभी नही हो सकती। मगर शिक्षा ही ऐसा हाथियार है जो लोगों मे बदलाव ला सकती है।

 

2 thoughts on “सामंतवाद की विषबेल : क्या गांव क्या शहर”

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