navratra

(सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख-पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियाँ तुझ ही को पुकारी।)… 2

स्मरण तेरा शुरू करें हम,
घट को स्थापित करके।
घट-घट में है तू ही बसती,
शक्ति जागृत करके।
अखण्ड जोत तेरी नव दिन बालूं,
मन से ज्ञापित करके।
धूप, अगर और करूँ क्या अर्पण,
तू ही मुझे समझा री।

सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियाँ तुझ ही को पुकारी।

भक्ति ये मन की पाट धरूँ माँ,
चौक को पूरित करके।
अन्न अंकुरित करना भी है,
माट में मिट्टी भरके।
झांकी तेरी लगती है निश्छल,
देख-देख मन हरखे।
मन के अब सब, द्वार में खोलूं,
आ इसमें बस जा री।

सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियाँ तुझ ही को पुकारी।

चैत्र-आश्विन, शुक्ल प्रतिपदा,
पूजन शुरू करें हम।
अगर जला कर ज्योति जलाएं,
अभी मिटे यह जग-तम।
थाल सजा कर करें आरती,
नाचे गाएँ सब हम।
तेरा साथ रहे अब निश दिन,
आशीष तू अपना लूटा री।
सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियाँ तुझ ही को पुकारी।

नव दिन तक नव रूप हैं तेरे,
एक-एक करूँ पूजन।
पूजूँ-गाऊँ तुझे सुनाऊँ,
नव दिन तक और क्षण-क्षण।
महिमा तेरी सब जग जाने,
क्या री करूँ अब वर्णन।
इस जग को सब तू बतलाती,
अब क्या-क्या लिखूं बतला री।

सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव-कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियां तुझ ही को पुकारी।

नव दिन जग करे शक्ति पासना,
विध-विध रूप की तेरे।
हो ब्रह्मी या गृहस्थ भले हो,
संन्यासी बहुतेरे।
शक्ति सभी को तू वर देती,
मनुज हो दनुज भलेरे।
कन्या रूप को करके पूजित,
जग सिद्धि प्राप्त करे री।

(सर्व अमंगल, मंगलकारी,
दुःख पीड़ा से तारण हारी।
जग-तम में तू ही उजियारी,
जीव कंटको में फुलवारी।
अब तो आजा, हे जग माँ तू,
यह दुनियाँ तुझ ही को पुकारी।)… 2

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