हिंदी का हित/अहित करती हिंदी संस्थाएं

प्रत्येक हिंदी सेवी संस्था दम भरती है कि एक वही संस्था है जो हिंदी के लिये पूर्णत: और सत्य के अंतिम छोर तक समर्पित है, बाकी की संस्थाएं तो हिंदी के नाम पर पैसा और नाम बटोर रही हैं। एक, दो नहीं, लगभग सभी को यही ग़लतफ़हमी है। कुछ संस्थाओं को तो यहां तक ग़लतफ़हमी है कि वे हैं तो हिंदी है, यदि वे नहीं तो हिंदी कहां!माना कि कुछ संस्थाएं इस सोच से परे हैं पर प्रथम पंक्ति की होड़ में शामिल प्रत्येक संस्था इस खुशफ़हमी में जी रही है कि यदि उनकी संस्था न रही तो हिंदी का क्या होगा? दर असल यही वे संस्थाएं हैं जिनके कारण हिंदी का ज्यादा अहित हो रहा है। ऐसा नहीं है कि ऐसी संस्थाएं केवल भारत में हैं बल्कि ऐसी सोच वाली संस्थाएं पूरे विश्व में फैली हुई हैं। कुछ संस्थाएं अवश्य ही लीक से हटकर कुछ काम करने का प्रयास कर रही हैं लेकिन अधिकतर संस्थाएं कवि सम्मेलन और काव्य गोष्ठियों और आपसी वैमनस्य से आगे नहीं बढ़ पा रहीं।
मैं तो ऐसी संस्थाओं से भी परिचित हूँ जो यदि कोई दूसरी संस्था का कोई कार्यक्रम है तो उसके कुछ अतिसमर्पित सदस्य वहां के कवियों व अन्य हिंदी प्रेमियों को बाकायदा फ़ोन करके मना करते हैं कि अमुक संस्था के कार्यक्रम में नहीं जाना है। तो प्रश्न यही है कि हम हिंदी के प्रचार-प्रस्तार-विकास-विस्तार के लिये काम कर रहे हैं या अपना निजि हितसाधन कर रहे हैं। और चलिये, अपना स्वार्थ भी साधिये लेकिन दूसरी संस्थाओं के हिंदी प्रचार-प्रसार की दिशा में चल रहे प्रयासों को कुंद करके हिंदी का नुकसान तो न करिये।
आज कल एक नया दौर चला है जिसे अच्छे शब्दों में कहिये तो हिंदी का भौगोलिक विस्तार और ऐसी संस्थाओं के शब्दों में कहिये तो हिंदी के नाम पर सैर-सपाटा। बात वहीं आकर रुकती है – आधा गिलास भरा या आधा खाली। हिंदी के नाम पर ऐसी संस्थाओं वाले एक चवन्नी खर्चने को तैयार नहीं और जो लोग २-३ लाख रुपया अपनी गांठ से लगाकर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये अलग-अलग जगहों पर एकत्रित होते हैं, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन करते हैं उन्हें ये संस्थाएं हिंदी के नाम पर सैर सपाटा करवाने वाली बताती हैं।
बहुत सी संस्थाएं सहयोग राशि एकत्रित कर साझे कहानी व काव्य संकलन निकालती हैं। यह एक प्रयास है हिंदी को आगे बढ़ाने का, बिना सरकारी मदद के, बिना किसी दबाव के। साहित्यकार जो इस तथ्य को समझ गये हैं वे खुशी से इन साझा संकलनों का हिस्सा बनकर हिंदी को आगे बढ़ाने में लगे हैं और जो नहीं समझ पा रहे, वो इसे कमाई का धंधा बता कर बहस में उलझा रहे हैं।
हर किसी की सोच उसकी अपनी है। जिन्हें ऐसे प्रयासों में कमाई की बदबू आ रही है, वे कुढ़ रहे हैं और जो इनकी महत्ता को समझ गये हैं, इस प्रकार के साझा प्रयासों को अंगीकार कर अपना नाम कर रहे हैं व हिंदी का प्रचार कर रहे हैं।
सकारात्मक सोच वालों को हमारा प्रणाम व नकारात्मक सोच वालों को भी हमारा प्रणाम।

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