साहित्यिक सम्प्रेषण के लिए भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का प्रधान माध्यम है जिसके सहारे वह अपनी भावनाओं, विचारों और चिंतन को पाठकों के सम्मुख रखता है। साहित्यिक भाषा प्रायः मानक, कलात्मक और भाषा का परिष्कृत रूप होती है। भाषा का अत्यधिक कलात्मक रूप भी कभी-कभी पाठक के हृदय को आह्लादित करने में बाधा उत्पन्न करती है। कलात्मक भाषा कहने का तात्पर्य छंद, प्रतीक, बिम्ब, अलंकार के प्रयोग से है। कविता के संदर्भ में कलात्मक भाषा का होना एक सीमा तक ही अनिवार्य है। इस संदर्भ में प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का विचार द्रष्टव्य है- “आज की कविता को जाँचने के लिए, जो अब सचमुच ‘प्रास के रजत पाश’ से मुक्त हो चुकी है, अलंकारों की उपयोगिता अस्वीकार कर चुकी है, और छंदों की पायल उतार चुकी है, काव्य-भाषा का प्रतिमान शेष रह गया है, क्योंकि कविता के संघटन में भाषा-प्रयोग की मूल और केन्द्रीय स्थिति है– ‘कविता उत्कृष्टम शब्दों का उत्कृष्टम क्रम है’।”1 छंद मुक्ति की वास्तविकता को अपराजेय कवि निराला ने रूपायित किया। उन्होंने नए युग की कविता को छंद से मुक्त किया परंतु लय, यति, गति और लड़ी को अत्यंतावश्यक बतलाया। वे आचार्य भामह के कथन ‘शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्’ और आचार्य विश्वनाथ के ‘वाक्यं रसात्मकम् काव्यम्’ को महत्त्व देते हैं। सहृदय के हृदय को रस-सिक्त करने वाली कविता ही कविता कही जा सकती है। निराला का मत है- “कवि’ का अर्थ नाचने वाला ठीक है। यह नर्तन ताल-ताल पर पैरों का उठना और गिरना नहीं, किंतु भावावेश में हृदय का नर्तन है। भावावेश में हृदय के नर्तन के साथ ही, शब्द भी निकलते रहते हैं। यदि शब्दों का अस्तित्व लुप्त कर दिया जाय तो भाव का भी लोप हो जाता है, क्योंकि भाव और शब्द परस्पर संबंध हैं। हृदय का नर्तन शब्दों की गति से ही होता है, अन्यथा वह जड़ और निष्प्राण सिद्ध होगा।”2 जड़ और निष्प्राण कविता को आज कौन पाठक याद रखता है? जो कविता भाव और विचार में आलोड़न न पैदा करे आज के संदर्भ में वह कविता नहीं कही जा सकती है। कोई मनुष्य कवि तभी बन सकता है जब उसमें प्रतिभा के साथ-साथ ‘विशिष्ट पद रचना रीति’ का ज्ञान हो। कविता में भाषा ऐसी होनी चाहिए जो भाव-सौन्दर्य उत्पन्न कर सके। रचनाकार के व्यक्तित्व में पककर समाज की भाषा का स्वरूप बराबर परिवर्तित होता चलता है। जिस तरह युग परिवर्तित होता रहता है, समाज गतिशील है उसी तरह भाषा भी निरंतर प्रवहमान है। भाषा में बदलाव देशज या अन्य भाषाओं के शब्दों का बहु-प्रयोग समाज में अंततः मानक भाषा के रूप में रूढ़ हो जाता है। वर्तमान समय की कविताओं में देशज और क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग हो रहा है जिससे कविता में जीवंतता बनी रहती है, सौन्दर्य उत्पन्न होता है, अर्थ विस्तार और प्रभाव उत्पन्न होता है।
समकालीन कविता में वंचितों की अस्मिता से संपृक्त युवा कवि हरिराम जी का सद्य-प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘कितने बदल गए आदिवासी’ में 82 कविताएँ संकलित हैं। इनकी कविताएँ विविध-विषयी हैं। इसमें दबे-कुचले लोगों (वंचितों) के दुख-दर्द, पीड़ा; सेठ-साहूकारों और पूँजीपतियों के वर्चस्ववादी शोषक रूप; वर्तमान परिवारों की विसंगतियाँ; स्त्री जीवन की असंगतियाँ; बेटी की शिक्षा; प्रेम में हिंसा; समाज में हिंसा; अम्बेडकरवादी चिंतन; स्वतंत्रता सेनानियों के साहस, शौर्य, बलिदान का चित्रण; जन-जागृति; प्रकृति के अनेकवर्णी चित्रण; खेत-खलिहानों, फसलों, जड़ी-बूटियों की उपयोगिता, भोज्य-व्यंजनों का चित्रण; राजस्थान की सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का चित्रण; राजनेताओं के दो-मुँहेपन का चित्रण; भाषा की चिंता आदि विषयक कविताएँ मुख्य रूप से शामिल है। प्रस्तुत संग्रह का भाषिक समीक्षा निम्न बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-
1. संप्रेषणीयता, 2. शब्द चयन, 3. अलंकार, 4. प्रतीक, 5. बिम्ब, 6. लय, यति, गति और लड़ी।
1. संप्रेषणीयता : कविता में सम्प्रेषण का सर्वाधिक महत्त्व है। सशक्त सम्प्रेषण के लिए गहरी संवेदना का होना आवश्यक है। तात्पर्य यह है कि जिस रचनाकार की संवेदना जितनी अधिक परिपक्व होगी उसकी कविता उतनी अधिक संप्रेषित करने में सक्षम होगी। प्रयोगवादी कविता के सूत्रधार अज्ञेय अपने एक निबंध ‘कविता का सम्प्रेषण’ में स्पष्ट लिखते हैं- “शब्द अपने आप में सम्पूर्ण या आत्यन्तिक नहीं है; किसी शब्द का कोई स्वयंभूत अर्थ नहीं है। अर्थ उसे दिया गया है, वह संकेत है जिसमें अर्थ की प्रतिपत्ति की गयी है। ‘एकमात्र उपयुक्त शब्द’ की खोज करते समय हमें शब्दों की यह तदर्थता नहीं भूलनी होगी वह एकमात्र इसी अर्थ में है कि हमने (प्रेषण को स्पष्ट, सम्यक् और निर्भ्रम बनाने के लिए) नियत कर दिया है कि शब्द-रूपी अमुक एक संकेत का एकमात्र अभिप्रेत क्या होगा।”3 कवि हरिराम के विवेच्य संग्रह में विषय की विविधता है, किन्तु एक समीक्षक के तौर पर यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि विषय सम्प्रेष्य नहीं होता वरन् विषयी (वस्तु) सम्प्रेष्य होता है जैसा कि अज्ञेय भी मानते हैं। सम्प्रेषण के स्तर पर कवि की मौलिकता यही है कि उनकी काव्य-संवेदना से उत्पन्न समस्त प्रभाव पाठक और श्रोता को बोधस्तर पर उन्मीलित और आह्लादित कर सकता है। कवि की कई कविताएँ हैं; जैसे- ‘प्यार की पींगे बढ़ाकर चली थी’, ‘पुरातन दौर में दबाकर’, ‘कागज की रद्दी से माँ’, ‘छीन लिया राज ठाठ’, ‘कभी होता था कुटुंब मुश्तरका’, ‘कटते जंगल’, ‘पढ़ बेटी’, ‘पथरीली घाटी के जंगल में’, ‘कितने बदल गए आदिवासी’, ‘भारत भूमि की बात ही निराली है’ इत्यादि, जो पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने में सक्षम होती है। कुछ काव्य पंक्तियों का अवलोकन करें तो अधिक स्पष्ट हो जाएगा-
“गलियाँ मैंने देखी तंग / रोटी की है अब भी जंग
भिखारियों की भी देखो लंबी कतार है
देखो तुम उदय भान / विश्व में बढ़ाता मान
क्या झुग्गी बस्तियों की अलग सरकार है
एक शहर में तीन काम / झुग्गी बस्ती खास आम
क्या असली भारत रोड के उस पार है
पुलिस थाना और कचहरी / सबकी नजरें ज्यों ठहरी
क्या दंड और न्याय का अलग दरबार है”4
और,
“हल्की सी देख झलक / उठी झुकी पलक
छा गए काले काले जलद गगन में
मीत मिलन खुशी / छाई है आनन पर
तड़प उसकी आई है बदन में
आँख मीचे बार बार / हया है तार तार
तब शरमाई है देख अपने भवन में”5
उपरोक्त उदाहरणों में सम्प्रेषण जबर्दस्त है। इसमें अर्थ-गाम्भीर्य विद्यमान है। इसके व्यापक अर्थ को समझने के लिए पाठक को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में शब्द की गहराई में उतरना पड़ेगा तभी काव्य का रसास्वादन किया जा सकता है। ‘क्या असली भारत रोड के उस पार है’- पंक्ति गहरी छाप छोड़ती है। इसके निहितार्थ से अंतरंगता स्थापित करने के लिए पाठक को ‘रोड के उस पार’ जाना आवश्यक होगा। वही दूसरे उदाहरण में शृंगारिकता के दर्शन होते हैं किन्तु ‘छा गए काले काले जलद गगन में’- पंक्ति में ‘जलद’ के स्थान पर बादल अथवा मेघ शब्द का प्रयोग होता तो इसकी संप्रेषणीयता व सौन्दर्य में वृद्धि होती। एक अन्य उदाहरण द्रष्टव्य है जिसमें सम्प्रेषण का अभिधा रूप दिखाई देता है जिसे पाठक या श्रोता सहजता से आत्मसात कर सकते हैं-
“वह नहीं डरती / कठिन मेहनत के काम से
सूखी ठंड, तपती गर्मी और / मूसलाधार बरसात से
तूफान के थपेड़ों से / समाज के नाम पर
वर्ण-व्यवस्था की दूकान / चलाने वालों से
रात के अंधेरे में घूमते / लुच्चे, लफंगे और भड़वों से।”6
2. शब्द चयन : सम्प्रेषण की प्रभावान्विति के लिए कवि को शब्द-चयन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यही वह बिन्दु है जहाँ से कवि कविता में आवश्यकतानुसार प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। सही शब्दों के चुनाव से कवि अपने भावों को सटीक अभिव्यक्ति दे पाता है और पाठकों को संवेदित करने में सक्षम हो सकता है। शब्द चयन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रयोगवादी कवि अज्ञेय ‘तारसप्तक’ के अपने वक्तव्य में कहते हैं- “शब्दों के साधारण अर्थ से बड़ा अर्थ हम उसमें भरना चाहते हैं, पर उस बड़े अर्थ को पाठक के मन में उतार देने के साधन अपर्याप्त हैं। … भाषा को अपर्याप्त पाकर विराम संकेतों से, अंकों और सीधी-तिरछी लकीरों से छोटे-बड़े टाइप से आदि सभी प्रकार के इतर साधनों से कवि उद्योग करने लगा। कवि भाषा की क्रमशः संकुचित होती हुई सार्थकता की केंचुल फाड़कर उसमें नया, अधिक, व्यापक, अधिक सारगर्भित अर्थ भरना चाहता है।”7 वर्तमान समय में भाषा की संकुचित सार्थकता को अधिक सारगर्भित बनाना ही कवि का लक्ष्य होना चाहिए जिससे उसकी कविता पाठक को संवेदना के उच्चतम स्तर तक ले जा पाय। कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का मानना था कि रचना एक जैविक इकाई है और वह भाषा की खुराक पर पलती है। खुराक क्या है तो भाषा के अवयव; जैसे- शब्द आदि। कवि हरिराम का काव्य शब्द-भंडार व्यापक है। जो कवि अपने भाषिक बंधन को जितना ढीला करेगा उसका शब्द-भंडार उतना ही समृद्ध होगा। विवेच्य संग्रह में शब्दों के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं-
तत्सम : हिन्दी भाषा का मूलाधार ही संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली है। ऐसे शब्द अधिकतर शिष्ट भावधारा से जुड़े हुए होते हैं। कवि ने तत्सम शब्दों का बहुतायत प्रयोग किया है किन्तु दुर्बोधता से बचने का प्रयास भी किया है; जैसे- प्रस्फुटित, अंबर, निशा, स्वप्न, आनन, संतति, प्रमोद, तृप्ति, कलरव, रज, कुकुरमुत्ता, मोक्ष, अनुष्ठान, मृत्यु, अद्यतन, आसव, आलस्य, कुंतल, नर, नारी, प्रजाति, मनुज, दीर्घायु, जठराग्नि, द्रुम, वंचित, पितृ, तद्रण, अद्रण, चिकुर, चुंबन, धन, क्षुदा, मनुज, वर्ष, शाखा, प्राण, शव, मूसलाधार, पयोधर, ब्रह्मांड, जनक, कुन्दन, उत्पल, प्रतीत, दुर्गम, हिमगिरि, वात्सल्य, शीर्ष, आहें, वेदना, ईर्ष्या, पतवार, दृगन, अनुराग, तोष, नतमस्तक, जलद, गगन, उमंग, ज्योत्स्ना, अधर, भास्कर, पर, अनजान, रवि, इत्यादि।
तद्भव और देशज : तत्सम शब्दों का ही सर्वसामान्य रूप तद्भव कहा जाता है जो उच्चारण की दृष्टि से आम नागरिकों के लिए सहज होता है। तत्सम शब्दावली जीवन के विविध क्षेत्रों को संपूर्णता में आकार (अर्थ) देती है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने कहा भी है- “तद्भव शब्दावली एक प्रकार से आदर्श संतुलन की स्थिति है, जो तत्सम विदेशी लोकप्रचलित या देशज शब्दों से भी अलग पर उनके केंद्र में से उभरती है।”8 “तत्सम शब्दों में अनुभूति का आडंबर व्यक्त होने की संभावना कम से कम है। इसीलिए वह कविता को अधिक प्रकृति और स्वायत्त होने की दिशा में ले जाती है।”9 कवि हरिराम काव्य को मानव जीवन को प्रकृति के अधिक समीप ले जाने क्रम में आंचलिक शब्दों का प्रयोग भी करते हैं। इससे अनुभूति में गहराई दिखाई देती है और लोकजीवन से जुड़ती प्रतीत होती है। यथा- सपना, कागज, पहर, ढकना, नाश्ता, सिरजोर, सुबह, शाम, बसेरा, फुर्तीले, मैल, रंगीन, कपड़ा, काठ, मुँह, गद्दार, चारपाई, तकिया, आँखें, देह, मीठा, छाल, चखना, थोक के भाव, फुहार, जुगाली, गोल-मटोल, चिपचिपा, हमजोली, मोहरा, कूंची, कलेवा, रद्दी, मटकी, लेप, गूँदती, छरहरी, चौथे, खुशियाँ, उड़ान, थाली, छुआछूत, चिलचिलाती, खरोंच, छाल, आततायी, बिजली, मुस्कान, गुदगुदाती, अंगड़ाई मौजूदगी, कीचड़, उलीचती, ठेकेदार, दुकान, जीवन, गुतगू, चाहत, कोसना, धड़कन, मझधार, कोख, निशानी, इत्यादि।
भारतीय बोलियों के शब्द : किसी भी भाषा के निर्माण में क्षेत्रीय बोलियों का अहम योगदान रहता है। कवि हरिराम ने अपने जीवन का आरंभिक समय गाँव (राजस्थान के) में बिताया है। उनका ग्रामीण संवेदन स्तर व्यापक है और वे अनुभूति को उसी रूप में व्यक्त करना भी चाहते है। इसलिए वे क्षेत्रीय बोलियों के शब्दों का सफल प्रयोग करने में सक्षम होते है। इनकी कविताओं में ब्रजभाषा, भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियों का प्रभाव दिखाई देता है।
राजस्थानी – पींगे, मींगना, छोंकड़ा, नातने, मुत, बीट, टिंट, शमशीर, सींगर, नुस्खा, लुगड़ी, नथ, टिमनिया, बोरला, छोरी, मालपुआ, चिरपिरे, चिलवा, चुरमा बाटी, दिकू, मुमाखी, हांडी, लखाते, इंगुदी, भांजा, कुम्मा, फडेश, सांधी, कमेड़ा, साँसन, डकराई, कटवावेगी, गुरिल्ला, लावणी, बेन, रण बांकुरे, कुलांचे, बैरन, तमैंडी, दगड़ा, मच्यो, टेरत, बोरला, नरमुंड, मूतन, मावट, थन, इत्यादि।
अवधी – महतारी, भोजाई, पिया, मनुहार, रोपत, चाहत, बतावत, लगावत, बेचत, मिलावत, इत्यादि।
ब्रजभाषा – सखिन, नैन, रैन, भरमावै, तिड़कावै, पखारे, करै, पै, देखि, छिड़कावे, बँधाए गावे, इत्यादि।
भोजपुरी – बलिहारी, बिनना, पंछी, लकुआ, उचट, गच्चा, उजास, फलियाँ, ठिठोली, छकाया, आदि।
पंजाबी – चंगा, आदि।
राजस्थानी बोलियों के शब्दों का प्रयोग परिवेश के अनुकूल किया है।
विदेशज : हिन्दी भाषा की शक्ति उसकी सामासिकता है। वह विविध संस्कृतियों व भाषाओं से निरतंर शब्द ग्रहण करती रही है, व्यापक जन-समूह के प्रयोग ने उसे अपना रंग दे दिया है। कविताओं में अलग-अलग भाषाओं के शब्द बाधा नहीं उत्पन्न करते बल्कि उसकी अर्थ और सौंदर्य में वृद्धि करते हैं। कवि शमशेर बहादुर सिंह ‘दूसरा तारसप्तक’ के अपने वक्तव्य में कहते हैं- “दो-चार अलग-अलग भाषाओं के अलग-अलग मिजाज की और उनकी अलग-अलग तरह की रंगीनियों और गहराइयों की जानकारी हमें जितना ही ज्यादा होगी उतना ही हम फैले हुए जीवन और उसको झलकाने वाली कला के अंदर सौंदर्य की पहचान और सौंदर्य की असली कीमत की जानकारी बढ़ा सकेंगे। भाषाओं की जानकारी के पीछे यह दृष्टिकोण कम से कम नए कलाकार के लिए तो बहुत काम का है।”10
अरबी-फारसी-उर्दू – खंजर, तहजीब, ईनाम, गिरफ्तार, नफरत, जिस्म, बदन, आरी, हवस, तामील, फिजा, अरमान, पुश्तैनी, कारोबार, घमासान, मुकाम, हाजमा, मर्ज, दौलत, बदनामी, हाजिर, सितम, गुलुमीर, बेशुमार, मुश्तरका, महफिल, पेशानी, फिजा, निगाह, वहशियों, तन्हाई, हमसफर, मदहोशी, लब, कारनामे, सरे बाजार, चमन, अमन, आलम, दर्ज, पनाह, लम्हों, शान, हया, नवाबी, माशूक, दिलबर, अल्फाजों, रुसवाई, पुश्त, अश्क, शिकवे, परिंदों, मुरीद, खौफ, कतार, हुक्का, मवाली आदि शब्द ।
अङ्ग्रेज़ी – लिविंग, रिलेशन, पेन, ब्रांचे, मशीन, डिज़ाइन, स्कूल, प्राइवेट, कॉलेज, मशीनरी, पुलिस, कलेंडर, जॉब, ब्लाइन्ड, सोशल, मीडिया, लॉन, फ्री, वोट, बैंक, लाइन, लूम-सिंगर, रोड, नंबर, रेल, रॉबिन हुड, परेड, इत्यादि शब्द।
3. अलंकार : भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा में अलंकार का विशेष महत्त्व है। आचार्य दंडी ‘काव्य शोभा के संपादक धर्मों को अलंकार’ मानते हैं। वर्तमान समय की कविताओं में अलंकारों का सप्रयास प्रयोग नहीं दिखाई देता है। कवियों के लिए कविता में भाव एवं विचार प्रधान होते हैं, किन्तु अर्थ-गांभीर्य हेतु यदा-कदा अलंकारों का प्रयोग भी परिलक्षित होता है। वास्तव में अलंकार कवियों की रचना के सौन्दर्य के रूप में समाविष्ट रहते हैं। पंत द्वारा ‘पल्लव’ की भूमिका में लिखा गया यह कथन स्मृत्य हो उठता है- “अलंकार केवल वाणी की सजावट के लिए नहीं, वे भाव की अभिव्यक्ति के विशेष द्वार हैं। भाषा की पुष्टि के लिए, राग की परिपूर्णता के लिए आवश्यक उपादान है; वे वाणी के आचार, व्यवहार, रीति, नीति हैं; पृथक स्थितियों के पृथक स्वरूप, भिन्न अवस्थाओं के भिन्न चित्र हैं। … वे वाणी के हास, अश्रु, स्वप्न, पुलक, हाव-भाव है।”11 इस युग के कवि अपने भावों एवं विचारों को सीधी-साधी भाषा में पाठकों एवं श्रोताओं तक अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है जब असमर्थ होता है तब वह अलंकारों का सहारा लेता है।
‘हँसी पर मानो दूब ज्यों उगी है’ 75,
‘हिमगिरि सा विशाल हृदय लिए’ – हृदय की विशालता की समता हिमगिरि से करने कारण उपमा अलंकार है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 71)
‘कटीले काजल की कोर को’ – ‘क’ वर्ण की आवृत्ति के कारण छेकानुप्रास अलंकार है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 70)
‘एक शहर में तीन काम / झुग्गी बस्ती खास आम’ – उदाहरण अलंकार (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 81)
“पुलिस थाना और कचहरी / सबकी नजरें ज्यों ठहरी” – ‘री’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अंत्यानुप्रास अलंकार है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 81)
“सर्दी की ठंडी रात में / कोहरा और पाला को / शीर्ष पर रोककर / गर्माहट का एहसास कराते हुए / अपनी गोद में / बिठा कर रखता है / अनगिनत प्राणियों को”12– प्रकृति पर मानव की क्रियाओं का आरोप होने के कारण मानवीकरण अलंकार है।
इसके अतिरिक्त उपमा, रूपक, समासोक्ति, विशेषोक्ति आदि अलंकारों का भी प्रयोग हुआ है।
4. प्रतीक : जब कोई वस्तु या कार्य किसी अप्रस्तुत वस्तु, भाव, विचार, क्रिया-कलाप, देश, जाति, संस्कृति आदि का प्रतिनिधित्व करता हुआ प्रकट किया जाता है, तब यह प्रतीक कहलाता है। प्रतीक (Symbols) अमूर्त विचारों, भावनाओं और जटिल अवधारणाओं को संक्षिप्त, सरल और सार्वभौमिक रूप से व्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं। काव्य भाषा में इसकी संश्लिष्टता के कारण चारुता और सौंदर्य में वृद्धि होती है तथा भाव अधिक परिपक्व होकर व्यक्त होते हैं। यथा-
‘आँगन में तेरे महकता फूल खिलाया’ – ‘फूल’ शब्द यहाँ संतान का प्रतीक है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 74)
‘पीले हाथ करके’ – यहाँ विवाह संस्कार से अभिप्रेत अर्थ निकलकर आता है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 82)
‘जब श्रम की मूरत नहीं बचेगी’ – इनकी कविताओं में ‘श्रम की मूरत’ शब्द का प्रयोग बार-बार किया है। यहाँ उन मजदूरों, किसानों और श्रमशील लोगों की ओर संकेत किया जा रहा है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 105)
‘मेवाड़ का सूर्य उदय हुआ’ – ‘सूर्य’ शब्द का मेवाड़ की धरती के महापुरुष के लिए हुआ है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 103)
‘पूरे घर की इज्जत / खुले बाजार बिक जावेगी’ – ‘घर की इज्जत’ शब्द का प्रयोग घर की लड़कियों-स्त्रियों के लिए किया गया है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 91)
‘रिश्तों के लिए / आँखों का पानी’ – ‘आँखों का पानी’ पद का प्रयोग यहाँ पारिवारिक संवेदना के लिए किया गया है। (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 73)
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कवि ने अधिकांश परंपरागत प्रतीकों का ही प्रयोग किया है।
5. बिम्ब : बिम्ब विधान के बिना काव्य सर्जन अत्यंत कठिन है विशेषकर भावों का सम्प्रेषण। इसी कारण हरवर्ड रीड ने कहा था कि काव्य तर्क का त्याग किया जा सकता है परंतु बिम्ब का नहीं। कवि अमूर्त भावना, विचार या रूप की पुनर्रचना के लिए कल्पना, भाव, स्मृति, ज्ञानेन्द्रियों आदि का सहारा लेते है। मस्तिष्क में किसी वस्तु का जो काल्पनिक चित्र बनता है, उसे ही बिम्ब कहते हैं। वस्तुतः मानस में निर्मित काल्पनिक चित्र है। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा लिखते हैं- “मनुष्य के जीवन में बिम्ब-विधान अथवा कल्पना विधान का बड़ा महत्त्व है। प्रस्तुत परिवेश संवेदनाओं और प्रत्यक्ष के अतिरिक्त उसके मानस में अतीत की तथा कभी अस्तित्व न रखने, न घटने वाली वस्तुओं और घटनाओं की असंख्य प्रतिभाएँ भी रहती है। बिम्ब शब्द उसी मानस प्रतिभा का पर्याय है।”13 कुछ प्रमुख बिंबों के प्रयोग द्रष्टव्य है-
घ्राण बिम्ब – ‘मौसम की खुशबू / समा गई थी नथुनों में’ (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 94)
‘अनाज की खुशबू से टूट पड़ी है चिंटावड़’ (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 41)
श्रव्य बिम्ब – ‘छम छम करती दगड़ा बुहारती’ (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 106)
चाक्षुष बिम्ब – “खेत में लहराती / फसल मकई / तने की चोटी पर / फूल की लटकन सी / आकर्षित करती / नर फूलों का पुष्पक्रम / मादा फूलों का कोब या कान / पार्श्व शाखा के शीर्ष पर / पैदा होते हैं” (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 53)
स्पर्श बिम्ब – “खींचती मंद मुस्कान / पतले होंठ / चूसने को हैं तैयार / प्रेम रस” (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 70)
आस्वाद्य बिम्ब – “बाजरे की रोटी के साथ / सब्जी का स्वाद / कच्ची सफेद मूली / अपना असर न भूली” (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 56)
स्मृति बिम्ब – ‘कभी होता था कुटुंब मुश्तरका’ (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 38)
इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रत्यक्ष बिम्ब, सरल बिम्ब, कल्पना बिम्ब आदि का भी प्रयोग यथानुरूप किया है।
6. लय, यति, गति और लड़ी : ये सभी छंद के अवयवों में समाहित हैं। वर्तमान समय के कवि की दृष्टि में वर्ण, मात्रा, लघु, गुरु आदि नियमों में बंधा कविता छंद के नाम पर कृत्रिम बनकर रह जाती है। वे मुक्त छंद में कविता करके अपने भाव व कल्पना को नई उड़ान देना चाहते हैं। क्रांतिकारी निराला ने स्पष्ट उद्घोषित करते हैं- “जिस गवैयों को ताल का ज्ञान न हो वह गायक गायक नहीं कहलाता, उसी तरह जिस कवि को छंद का ज्ञान नहीं, वह कवि भी कवि की श्रेणी में नहीं आता। कविता में और सब दोष क्षम्य हैं, पर यति-भंग, गति-भंग अक्षम्य अपराध है।”14 तात्पर्य मुक्त छंद में कविता भले की जाये किन्तु लय, यति, गति, लड़ी यथानुरूप प्रयोग किया जाना आवश्यक है। अगर कोई कवि ऐसा नहीं करता है तो उसका काव्य विचारों के होते हुए भी उचित संवेदना पाठकों के हृदय में उत्पन्न नहीं कर पाएगा। तीसरे सप्तक के कवि प्रयाग नारायण त्रिपाठी ने कहा भी है- “कविता में चाहे वह आज की हो या आगामी काल की – यदि लय नहीं है, यदि तन्त्र कौशल नहीं है, यदि वह कथन मात्र है न कि रचना तो उसे मैं कविता नहीं कहूंगा।”15 कवि हरिराम मुक्त छंद में कविता लिखते हैं किन्तु कहीं लय और तुक का प्रयोग दिखाई देता है। इनकी कविताओं में यति, गति और लड़ी का प्रायः अभाव है। इसीलिए विषय-वस्तु यथार्थपरक होते हुए भी पाठकों के जुबान पर पूरी तरह चढ़ नहीं पाता।
लय और तुक का प्रयोग – “देता सुगंध / बालों की गंध / सुडोल सा तन / गदराये बदन पर / हर्षित मन / गोल आनन पर” (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 87) सुगंध, गंध, तन, मन, पर शब्दों में तुकांत देखने को मिलता है और लय भी।
एक अन्य उदाहरण देखें- “चढ़े भाव बाजार के / हालत हो गई पस्त / सरसों गेहूँ की आवक देखकर / वणिक हो गया मस्त” (कितने बदल गए आदिवासी, पृष्ठ- 89)
लोकोक्ति और मुहावरे : लोकोक्ति और मुहावरे कविता की आत्मा को जीवंत बनाते हैं। मुहावरे का प्रयोग भाषा को प्रभावशाली, सरस, संक्षिप्त, सजीव तथा संप्रेषणीयता में वृद्धि के लिए किया जाता है। कवि हरिराम की कविताओं में जिन मुहावरों का प्रयोग हुआ है वे अनायास ही हुए हैं। यथा- ‘मुँह की खाई’ (पृष्ठ-95), ‘मर मिटने को तैयार’ (पृष्ठ-118), ‘बाल की खाल निकालने के खातिर’ (पृष्ठ-109), ‘भड़वे माल खा रहे’ (पृष्ठ-109), ‘मलाई उड़ाई’ (पृष्ठ-104), ‘मुगलों ने मुँह की खाई’ (पृष्ठ-102), ‘कोई ऊँच नीच हो गई तो / हमारी नाक कटवावेगी’ (पृष्ठ-91), ‘मनेगी उसकी दिवाली’ (पृष्ठ-88), ‘कर खून आलूदा खंजर पीठ घुसाया है’ (पृष्ठ-33) इत्यादि।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इनकी कविताओं में कोई बनावटीपन नहीं है। इन्होंने अपनी अनुभूति को कला से माँजने का प्रयास नहीं किया है। जो भाव जैसे उठे वैसे ही शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। सरल-सहज भाषा और शैली यथार्थपरक विषयों की अभिव्यक्तीकरण में सामान्य प्रतीत होता है। ‘रति’ और ‘श्रम की मूरत’ शब्द अनेक कविताओं में आया है। समाज में अश्लील माने जाने वालों दो-तीन शब्दों का भी प्रयोग है। व्यंजना और लक्षणा शब्द-शक्ति का प्रयोग प्रसंगानुकूल किया गया है। कवि में संकेत में बातें कहने की कमी है। आशा है आगामी संग्रहों में कवि की परिपक्वता नजर आएगी।
संदर्भ सूची :
1. सिंह, नामवर, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 98
2. नवल, नन्दकिशोर, सम्पादक, निराला रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवाँ संस्करण- 2014 ई., पृष्ठ संख्या- 160
3. साभार : batenaurbaten.com
4. हरिराम, कितने बदल गए आदिवासी, अधिकरण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2024, पृष्ठ संख्या- 81
5. वही, पृष्ठ संख्या- 76
6. वही, पृष्ठ संख्या- 43
7. अज्ञेय, संपादक, तारसप्तक, वक्तव्य- अज्ञेय, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नयी दिल्ली, छठा संस्करण- 1995, पृष्ठ संख्या- 222
8. चतुर्वेदी, डॉ. रामस्वरूप, अज्ञेय और आधुनिक रचना की समस्या, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, तीसरा संस्करण : 1990, पृष्ठ संख्या- 40
9. वही, पृष्ठ संख्या- 4
10. अज्ञेय, संपादक, दूसरा तारसप्तक, शमशेर बहादुर सिंह का वक्तव्य, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, द्वितीय संस्करण : 2002, पृष्ठ संख्या- 87
11. पंत, सुमित्रानंदन, पल्लव, भूमिका से साभार
12. हरिराम, कितने बदल गए आदिवासी, अधिकरण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2024, पृष्ठ संख्या- 77
13. वर्मा, डॉ. धीरेन्द्र, हिन्दी साहित्य कोश, पृष्ठ संख्या- 514
14. नवल, नन्दकिशोर, सम्पादक, निराला रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पाँचवाँ संस्करण- 2014 ई., पृष्ठ संख्या- 234
15. प्रयाग नारायण त्रिपाठी, तीसरा सप्तक, नई कविता के सात अध्याय, डॉ॰ देवेश ठाकुर, पृष्ठ संख्या – 16
